'हिंदी मीडियम' मूवी रिव्यूः इस देश में अंग्रेजी ज़बान नहीं एक क्लास है!

On Date : 18 May, 2017, 9:03 PM
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मुंबई : आपने हिंदी मीडियम से पढ़ाई की है? दिल्ली की लाइफ स्टाइल से वाकिफ हैं? इंग्लिश मीडियम स्कूल में बच्चों के एडमिशन की जद्दोजहद से गुजरे हैं? तो फिर आप बिना रिव्यू पढ़े भी ‘हिंदी मीडियम’ देख सकते हैं. निराश नहीं होंगे.

फिल्मः हिंदी मीडियम
अवधिः 150 मिनट
निर्देशकः साकेत चौधरी
कास्टः इरफान खान, दीपक डोबरियाल, सबा क़मर इत्यादि.
रेटिंगः 3.5/5 स्टार

हिंदी मीडियम भले ही कम बजट की फिल्म हो लेकिन इसमें एक दमदार कहानी है, परिस्थितियों में पनपता जबरदस्त हास्य है, बेजोड़ अदाकारी है, ज़ुबान पर चढ़ जाने वाला संगीत है. आप एक बॉलीवुड फिल्म से इतना ही उम्मीद रखते हैं ना? तो फिर आपके लिए फिल्म में एक कॉम्प्लिमेंटरी संदेश भी है.

कहानीः फिल्म की कहानी है पुरानी दिल्ली में रहने वाले कपल राज-मीता और उनकी बेटी पिया की. राज (इरफान खान) की चांदनी चौक में कपड़े की बड़ी दुकान है. लक्जरी कारें हैं. पैसों की कोई कमी नहीं है. बला की खूबसूरत बीवी है. प्यारी सी बच्ची है. राज हिंदी में सोचता है और हिंदी में बोलता है. उसकी बीवी नहीं चाहती जैसे उन दोनों की ज़िंदगी रही है उनकी बेटी पिया भी वैसी ही रह जाए. एक मैगजीन में मीता (सबा क़मर) दिल्ली के टॉप रैंकिंग स्कूलों की लिस्ट देखती है. बस यहीं से फिल्म में हंसी-ठहाकों की ‘रोलर-कोस्टर’ राइड शुरू होती है और आखिर में कुछ नैतिकता के संदेशों के साथ एक सवाल पर आकर थम सी जाती है.

अभिनयः फिल्म देखते हुए अगर आप कास्टिंग को किसी और कलाकार से रिप्लेस करना चाहते हैं तो आपको एक शख्स नहीं समझ आएगा जो इनके रोल को इतनी बखूबी निभा सके. इरफान और दीपक डोबरियाल की अदाकारी ऐसी कि ये आपको आस-पास की ज़िंदगी के किरदार ही नज़र आते हैं. शुरुआत से इरफान इस फिल्म को अपने कंधे पर लेकर चलते हैं लेकिन दीपक डोबरियाल की एंट्री इसको एक नई ऊंचाई पर पहुंचा देती है. एक ऐसी उंचाई जहां पर इरफान भी थोड़े फीके से लगने लगते हैं. पाकिस्तानी अभिनेत्री सबा क़मर ने भी बॉलीवुड में धमाकेदार उपस्थिति दर्ज की है.

निर्देशनः निर्देशक साकेत चौधरी इससे पहले ‘प्यार के साइड इफेक्ट’, ‘शादी के साइड इफेक्ट’ जैसी फिल्में बना चुके हैं. क़ायदे से तो उन्हें इस फिल्म का नाम ‘औलाद के साइड इफेक्ट’ रखना चाहिए था. क्लाइमैक्स को छोड़ दिया जाए तो ढ़ाई घंटे की फिल्म दर्शक को बांध कर रखती है. यही साकेत चौधरी की सफलता है. कुछ सीन में लॉजिक भी गच्चा खा जाते हैं लेकिन वो इतने छोटे हैं कि दरकिनार किया जा सकता है.

संगीतः फिल्म में चार गाने हैं. सभी ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं. गुरु रंधावा का ‘सूट तेनु सूट करदा’ फिल्म खत्म होने के बाद क्रेडिस्ट में आता है. दर्शक यही गुनगुनाते हुए बाहर निकलते हैं. आतिफ असलम ने हूर गाकर एकबार फिर अपनी आवाज़ की जादूगरी साबित की. क्लाइमेक्स में तनिष्का का गाया ‘एक जिंदड़ी’ भी बिल्कुल फिट बैठता है.


मजबूत पक्षः ट्रेलर में दिख रहे वनलाइनर और पंच लाइन इस फिल्म की जान हैं. फिल्म में ये बहुतायत में हैं. एक सीन में आपकी हंसी थमती है कि दूसरा डोज दे दिया जाता है. आपकी हंसी पूरे सिनेमा हाल में गूंज रही होती है. अभिनय लाजवाब है. यह तो हो गई इंटरवल से पहले की बात.


कमजोर कड़ीः इंटरवल के बाद कहानी अपने संदेश का प्लॉट तैयार करने में लग जाती है. जो क्लाइमेक्स में एक बोरिंग से लेक्चर पर खत्म होता है. जो ना तो आपको भावुक कर पाता है और ना ही बहुत प्रभावित. क्लाइमेक्स में इरफान का एक डॉयलाग है… इस देश में अंग्रेजी ज़बान नहीं एक क्लास है. ये कमेंट आपको सोचने पर मजबूर कर देता है. आप इस कमेंट को घर तक लेकर जाते हैं. फिर अगली सुबह उठते हैं. डॉयलाग भूलकर एकबार फिर उस अंग्रेजी क्लास में फिट होने की जद्दोजहद में लग जाते हैं.

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