'दूसरे देशों का साहित्य सिर्फ मनोरंजन करता है'

On Date : 15 April, 2018, 4:33 PM
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ग्वालियर। भारतीय साहित्य सृजन गतिशील है। दुनिया के दूसरे देशों में भी साहित्य फलता-सृजन फूलता है। लेकिन अभी वह नियमावली नहीं बना है। भारतीय साहित्य चित्त को आनंदित करता है। दुनिया की पहली कविता तत्सविर्तुवरेण्यम...भी ऋग्वेद के तीसरे मंडल से आई है। बाद में इसे शक्ति देने के लिए ऊं भूर्भव स्व: जोड़ा गया। हालांकि यह मंत्र है, लेकिन मैं इसे कविता कहना पसंद करता हूं। क्योंकि मंत्र यांत्रिक है कविता की तरह आत्मिक नहीं होते। इस कविता का सामर्थ्य इतना बड़ा है कि इसके जाप से ही मन को शांति मिलती है, यही साहित्य का सामर्थ्य है। यह बात उत्तरप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष और साहित्यकार हृदयनारायण दीक्षित ने कही। मध्य भारतीय हिंदी साहित्य सभा की ओर से राष्ट्रोत्थान न्यास भवन में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि दुनिया के अन्य देशों का साहित्य सृजन इथिक्स पर नहीं बना है, यह केवल मनोरंजन करता है। इसने सोच-विचार के नए आयाम तो खोले हैं, लेकिन यह मयार्दा नहीं बना।
जबकि रामचरितमानस के एक-एक अक्षर में संविधान के नीति-निदेशक तत्व छिपे हैं। उन चौपाइयों में स्पष्ट है कि माता-पिता, पत्नी और शत्रु से कैसे बात करनी है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री नारायण सिंह कुशवाह, विशिष्ट अतिथि अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्रीधर पराड़कर थे। इस दौरान हृदय नारायण दीक्षित को स्व. उर्मिला मिश्रा राष्ट्रीय साहित्य सृजक सम्मान-2017 से सम्मानित किया।

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