‘नोटा से रिजेक्ट कौन ना-लायक नेता या लोकतंत्र

On Date : 08 October, 2013, 4:09 PM
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मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव मतदाताओं को मिलने वाले राइट टू रिजेक्ट का नोटा बटन (नन आफ द अबव) लोकतंत्र की दिशा में क्या रिजल्ट देने वाला है, इसका सभी को इंतजार है। यह पौराणिक कथा सागर मंथन की तरह है, जिसमें अमृत से पहले जहर भी निकला था। मंथन से निकलने वाली हर चीज अमृत नहीं हो सकती यह जितना स्थापित सत्य है, उतना ही यह भी कि प्राप्त परिणाम के परीक्षण के बाद ही पता होता है कि वह कितनी पॉजिटिव है या निगेटिव। ऐसे ही हालात में राइट टू रिजेक्ट के ‘नोटा बटन’ को लेकर कई सवाल मतदाताओं के मन में उमड़-घुमड़ रहे हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार अपने सरोकारों को निभाने वाले मीडिया समूह के रूप में प्रदेश टुडे  इस दिशा में एक जनभागीदारी पहल करने जा रहा है। आम और खास लोगों समेत युवाओं और आॅनलाइन दुनिया के बुद्धिजीवियों को प्रदेश टुडे एक मंच उपलब्ध करा कर, सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई इस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विचार इकट्ठे करने जा रहा है कि आखिर लोकतंत्र में राइट टू रिजेक्ट से क्या हासिल होने वाला है। क्या ये वाकई लोकतंत्र को मजबूती देगा? क्या इससे वाकई भ्रष्ट-बेईमान और दागी लोगों को रोका जा सकेगा? क्या नन आॅफ अबव (इनमें से कोई नहीं का विकल्प) कहीं वोट बैंक जुगाड़ने वाले रसूखदारों का खिलौना तो नहीं बन जाएगा? यानी रिजेक्ट करने के अधिकार से क्या खारिज होने वाला है? ना-लायक नेता या लोकतंत्र? समस्याएं, उलझनें और इससे जुड़े सवाल बहुत पेचीदा है, लेकिन फिर भी यह बात लोकतंत्र की सेहत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन लोगों के वोट न डालने का बहाना खत्म करने का आधार बनेगा, जो यह कहते हैं कि कोई नेता वोट प्राप्त करने लायक नहीं। लोग यह भी कह सकते हैं कि जब नन आॅफ अबव को काउंट किए बिना ही निर्वाचन होना है तो नोटा बटन दबाने का क्या फायदा? हालांकि इस बात के आसार भी कम नहीं कि पहली बार वोट डालने वाले या अपेक्षाकृत युवा जो सोशल नेटवर्किंग की आभासी दुनिया में सक्रिय हैं या किसी भी राष्ट्रीय आंदोलन की आहट भर से सड़कों पर उतरने के लिए बेताब रहते हैं, वे लोकतंत्र के दागों से निपटने के लिए ‘नोटा बटन’ दबाने को ट्रेंड में बदल दें क्योंकि ‘नोटा’ को लेकर सबसे ज्यादा युवा ही क्रेजी हैं। ऐसे में आशंका है कि किसी ट्रेंड में फंस कर वह अपने वोट को व्यर्थ न कर बैठें। बहरहाल, सवाल बहुत हैं और उनका जवाब 21वीं सदी के सबसे बड़े जवाबों में से एक साबित होगा। प्रदेश टुडे लगातार आपको इस विषय से जुड़ी जानकारियों के साथ, इंस्टीट्यूशंस और विद्वानों के विचार और संबंधित सवालों को आप तक पहुंचा कर आपका ओपिनियन जानेगा?  इन जवाबों को एकत्र कर देश के प्रतिष्ठित विद्वानों, चुनाव आयोग और पीयूसीए या इलेक्शन रिफार्म जैसी संस्थाओं के बीच रखेगा ताकि जब आप अपने मताधिकार का उपयोग करने जाएं तो आपका फैसला बिल्कुल दुरुस्त रहे कि आप क्या करने जा रहे हैं और इससे क्या हासिल होगा? मजबूत लोकतंत्र की दिशा में प्रदेश टुडे की इस पहल में आपके सहयोग की कामना है। 

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