आखिर मान लिया ग्वालियर में सूखा है

On Date : 12 October, 2017, 2:33 PM
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प्रदेश टुडे ने 4 दिन पहले उठाया था अन्नदाताओं का मुद्दा
प्रदेश टुडे संवाददाता, ग्वालियर

सूखे की मार से बदहाल किसानों की पीड़ा के गंभीर मसले को आखिर सिस्टम ने मान लिया और जिले की पांच तहसीलों को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया गया है। दरअसल अंचल में बारिश की कमी के चलते खरीफ की फसल का रकबा आधा रह गया है और रबी की फसल को लेकर किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें गहराती जा रही थीं। वहीं अफसरों की लापरवाही से सूबे की सरकार ऐसे हालातों में अन्नदाता की परेशानी से बेखबर बनी हुई थी।
कुदरत के कहर की मार से कराहते अंचल के अन्नदाता की पीड़ा को ‘प्रदेश टुडे’ ने हाल ही में 7 अगस्त के अंक में ‘अन्नदाता की परेशानी से बेखबर सरकार ’ शीर्षक के साथ प्रमुखता से उठाया था।  बताना मुनासिब होगा कि जिले में इस साल खरीफ की बोनी निर्धारित लक्ष्य की आधी रह गई है। प्रशासन के आंकड़े बताते हैं कि इस साल खरीफ फसलों के लिए 106214 हैक्टेयर का लक्ष्य तय किया गया था लेकिन पर्याप्त बरसात नहीं होने से जिले में केवल 54316 हैक्टेयर रबके में ही बोनी हो सकी है, जो लक्ष्य का करीब आधा (51.4 प्रतिशत) है।

47% कम रहा बारिश का कोटा
मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि जिले में इस साल औसत वर्षा केवल 404 मिलीमीटर हुई है। वहीं पिछले साल औसत बारिश 505.7 मिमी. रही जबकि जिले की सामान्य औसत वर्षा है 751.2मिमी. रहती है।
पिछले साल से भी बुरा हाल

  • भितरवार: इस साल 243 मिमी. जबकि पिछले साल थी 368.4 मिमी.
  • डबरा:  इस साल 255.5 मिमी. जबकि पिछले साल रही 494.4 मिमी.
  • घाटीगांव:  इस साल 409 मिमी. जबकि पिछले साल  थी 425.8 मिमी.
  • मुरार:  इस साल 708.4 मिमी. जबकि पिछले साल रही 563.8 मिमी.।


मुफलिसी के मुहाने पर किसान
जमीनी हालात बताते हैं कि मौसम की बेरुखी से अंचल का अन्नदाता मुफलिसी के कगार पर पहुंच चुका है। जिले की भितरवार तहसील का सबसे बुरा हाल है। दरअसल यहां खरीफ फसलों की बोनी का आंकड़ा उम्मीद का केवल 23.63 प्रतिशत सिमटकर रह गया। दस्तावेजों में दर्ज आंकड़े के मुताबिक इस साल डबरा तहसील के अंतर्गत 6325 हैक्टेयर में ही खरीफ की फसल की बोनी हो सकी है जो यह लक्ष्य का केवल 44.31 प्रतिशत है। वहीं घाटीगांव तहसील में 8150 हैक्टेयर में बोनी हो सकी है और यह लक्ष्य का 64.17  प्रतिशत है। खास बात ये है कि प्रशासनिक स्तर पर प्रमाणित यह आंकड़े केवल बोनी के हैं जबकि इसमें से भी बड़ी तादात में फसलें पानी के अभाव में खेतों में ही सूख जाने का खतरा बना हुआ है।

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