सुरों से सौंवे वर्ष का आगाज

On Date : 11 January, 2018, 3:04 PM
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माधव संगीत महाविद्यालय के शताब्दी वर्ष पर संगीत समारोह आयोजित

प्रदेश टुडे संवाददाता, ग्वालियर
शहर के प्रतिष्ठित माधव संगीत महाविद्यालय के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित पहले संगीत समारोह में सुरों के मुख्तलिफ रंग देखने को मिले। इसी महाविद्यालय में कभी अध्यापन कार्य करने वाले पं. महेश दत्त पांडेय से खांटी ग्वालियर घराने की गायकी सुनने को मिली तो मुंबई से आर्इं पद्मश्री डॉ. शोमा घोष ने उपशास्त्रीय संगीत का जादू बिखेरा। इस पहले आयोजन के साथ शुुरु हुआ शताब्दी वर्ष का यह सफर पूरे साल चलेगा। उम्मीद है कि समापन पर बड़ा आयोजन होगा।
संस्कृति संचालनालय के सहयोग से आयोजित महाविद्यालय के शताब्दी वर्ष समारोह का शुभारंभ ग्वालियर घराने के यशस्वी गायक पं. महेश दत्त पांडे के गायन से हुआ। बताना मुनासिब होगा कि श्री पांडे ने दस वर्षों तक माधव संगीत महाविद्यालय में अध्यापन कार्य किया है। इसके बाद वे रेडियो की सेवा में चले गए। कोई 25-26 साल बाद कॉलेज प्रबंधन द्वारा गाने के लिए बुलाए जाने से श्री पांडे बेहद भावुक थे और अभिभूत भी। बहरहाल उन्होंने अपने गायन के लिए चुना राग ‘पूरिया धनाश्री।’ संक्षिप्त आलाप के साथ शुरु करके उन्होंने इस राग में दो बंदिशें पेश की। तिलवाड़ा में निबद्ध विलंबित बंदिश के बोल थे- ‘‘सदारंग नित अकर देत दुआएं।’’ जबकि तीन ताल में मध्यलय की बंदिश के बोल थे- ‘‘पायलिया झनकार’’। दोनों ही  बंदिशों को पांडेजी ने बड़े मनोयोग से गाया। उनके स्वर लगाने के अंदाज से ही ग्वालियर की घरानेदार गायकी का स्वरुप खड़ा हो गया। राग का विस्तार करने में एक-एक सुर खिलता चला गया और उसके बाद बहलावों व विविधतापूर्ण तानों की अदायगी ने रसिकों को सिक्त कर दिया। खुला आवाज की उनकी गायकी में राग मानों साक्षात खड़ा गया। अष्टांग गायकी की झलक उनके गायन में देखने को मिली। उन्होंने अपने गायन का समापन कबीर के भजन ‘‘भजो रे मैया रास गोविंद हरी’’ से किया। पीलू के स्वरों में पगे इस भजन को गाने में श्री पांडे सुरों में ऐसे डूबे कि रसिक भी मुग्ध हो गए। उनके साथ तबले पर पं. अनंत मसूरकर व हारमोनियम पर संजय देवले ने बेहद सटीक संगत का प्रदर्शन किया। जबकि तानपूरे व गायन पर साथ दिया यश देवले ने।  सभा की अगली प्रस्तुति में पं. अनंत पुरंदरे व अंकुर के वायलिन वादन की जुगलबंदी ने भी खूब रंग भरे। दोनों ने राग यमन में जुबलबंदी पेश की। उन्होंने तीन गतें पेश की, जो तीन ताल में निबद्ध थीं। पं. अनंत पुरंदरे मूलत: वायलिन वादक हैं, लेकिन संतूर के साथ उन्हें पहली दफा देखा-सुना गया। उन्होंने इसे पूरी शिद्दत से निभाया। हां, इस प्रस्तुति में दो तबलों की संगत थोड़ी खटकी। तबले पर विनय बिन्दे और श्याम शंकर माहौर ने संगत की।
सभा का समापन मुंबई से आई बनारस घराने की गायिका पद्मश्री डॉ. शोमा घोष के गायन से हुआ। शोमाजी ने ख्याल जरुर प्रस्तुत किया, पर जिस तरह की गायकी उन्होंने प्रस्तुत की, उससे लगता है कि वे उपशास्त्रीय व सुगम संगीत की बेहतरीन गायिका है। उन्होंने राग कलावती में दो बंदिेशें पेश कर उसके बाद शिव तांडव स्त्रोत तराना , टप्पा, ठुमरी और गजल गायकी तक के रंग बिखेरे। रसिकों के लिए यह प्रस्तुति भी अनूठी रही।

इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए मुख्य अतिथि संत कृपाल सिंह ने कहा कि हमारा संगीत अध्यात्म से जुड़ा है, और यह ईश्वर प्राप्ति का माध्यम है। कार्यक्रम की अध्यक्षता महंत रामसेवक दास ने की। दोनों ही संतों ने शताब्दी वर्ष की सफलता के लिए कामना की। कार्यक्रम में प्रभारी प्राचार्य मुकेश सक्सैना ने संस्था के इतिहास की जानकारी दी। कार्यक्रम का संचालन डॉ. वीणा जाशी ने किया।

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