हिन्दी दिवस : अंग्रेजी की भीड़ में गुम नहीं हुई है हिन्दी

On Date : 14 September, 2017, 8:13 AM
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नई दिल्ली : कुछ दशक पहले अंग्रेजी की भीड़ में गुम हो गई थी हिन्दी. लेकिन अब फिर से हिन्दी न केवल अंग्रेजी को चुनौती देने के लिए खड़ी हो गई है बल्कि अब बेस्टसेलर जैसे तमगे हिन्दी की किताबों को भी नसीब होने लगे हैं. अंग्रेजी के बड़े बाजार में, हिन्दी पाठकों की संख्या कम ही सही लेकिन धीमी रफ्तार से बढ़ रही है. अब आपको मेट्रो के किसी कोने में कोई अच्छा हिन्दी साहित्य प्रेमी भी नजर आ सकता है. कहने का मतलब ये है कि बुक शॉप्स में अंग्रेजी की किताबों से भरी अल्मारियों के बीच हिन्दी की किताबें भी अपनी जगह बना रही हैं जो कुछ साल पहले तक कहीं दूर कोने में धूल फांकती रहती थीं.

हिन्दी साहित्य ही नहीं हिंदी में शोध भी रफ्तार पकड़ रहा है. प्रीति मिश्रा को ही देख लीजिए. वह आईआईटी दिल्ली से भाषा विज्ञान में पीएचडी कर रही हैं. स्कूल के दिनों में वह कभी कभार हिन्दी की कहानियां पढ़ती थीं. लेकिन कई साल पहले जब एक दोस्त ने उनकी मुलाकात हिन्दी साहित्य से कराई तो यह मुलाकात जुनून में बदल गई.

उनकी आवाज में ही इस बात को लेकर गर्व की भावना झलक रही थी. उन्होंने कहा, 'उसके बाद मुझे महसूस हुआ कि हिन्दी साहित्य की दुनिया कितनी बड़ी और खूबसूरत है.' हिन्दी के वरिष्ठ रचनाकारों निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह का नाम उनकी जुबान से सुनना सुखद लगता है, वह भी उस जमाने में जब बच्चों को स्कूल में हिन्दी शब्दों का अर्थ अंग्रेजी शब्दों से समझाया जाता हो.' प्रीति को सआदत हसन मंटो और गुलजार के शब्दों की दुनिया बेहद हसीन लगती है.

फिल्मी अभिनेताओं और निर्देशकों की मौजूदा पीढ़ी में कई ने हिन्दी साहित्य पढ़ा है.
प्रीति का हिन्दी जबान के लिए इश्क चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो लेकिन हिन्दी के लेखक कुणाल सिंह की पेशानी पर ये सोच कर बल पड़ जाते हैं कि आजकल की पीढ़ी हिन्दी साहित्य से मुंह मोड़ चुकी है. उनके हिसाब से युवा पाठक अंग्रेजी में अधिक रूचि लेता है. हालांकि उन्हें इसमें कुछ गलत नजर नहीं आता. 'रोमियो, जूलियट और अंधेरा' के लेखक कहते हैं कि युवा पीढ़ी फैशन के चलते अंग्रेजी किताबें पढ़ती है लेकिन जो वह पढ़ रही है वह साहित्य नहीं बल्कि पल्प फिक्शन है. वह इरफान खान का जिक्र करते हुए कहते हैं कि फिल्मी अभिनेताओं और निर्देशकों की मौजूदा पीढ़ी ने हिंदी साहित्य पढ़ा है.

कोरपोरेट कम्युनीकेशन आफिसर रितिका प्रधान मन की शांति के लिए हिन्दी की किताबें पढ़ती हैं. उनकी परवरिश ऐसे परिवार में हुई, जहां पढ़ने को एक अच्छा काम माना जाता था. लेकिन वह दिल्ली मेट्रो का अपना एक हालिया अनुभव साझा करती हैं कि कैसे हिंदी के खिलाफ पूर्वाग्रह है. एक दिन वह मेट्रो में सफर करते हुए हिन्दी की कोई किताब पढ़ रही थीं और उनके पास बैठी एक लड़की ने सवाल किया, 'आप हिन्दी क्यों पढ़ रही हैं. क्या आपको यह समझ आती है?' इस लड़की ने प्रधान को यह तक सुझाव दे डाला कि उन्हें अंग्रेजी की दुनिया में अपनी पकड़ बनाने के लिए चेतन भगत की 'हॉफ गर्लफ्रेंड' से शुरूआत करनी चाहिए. प्रधान रात को सोने से पहले हिन्दी की कोई किताब पढ़ती हैं. इससे उन्हें मानसिक शांति मिलती है.

70 साल पुराने प्रकाशन समूह राजकमल प्रकाशन के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम महसूस करते हैं कि हिन्दी की किताबों के आनलाइन उपलब्ध होने से भी हिन्दी साहित्य को प्रासंगिक बने रहने में मदद मिली है. वह बताते हैं, 'पिछले सालों में हमने हिन्दी के पाठकों की संख्या में इजाफा देखा है. हालांकि इसके लिए बहुत से कारण हैं लेकिन आनलाइन बुक स्टोर्स ने इसमें प्रमुख भूमिका अदा की है.' अंग्रेजी की बेस्ट सेलर किताबों के हिन्दी अनुवाद के बारे में निरूपम कहते हैं कि हिन्दी का गंभीर पाठक इन किताबों को नहीं खरीदता. अधिकतर हिंदी पाठक संस्मरणों, आत्मकथाओं या उन कहानियों में दिलचस्पी रखता है जो आम आदमी की कहानियों जैसी लगती हैं.

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