कातिल पर भारी ‘कलामाना’ करिश्मे

On Date : 30 July, 2015, 2:17 PM
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देश पर निसार होने का सिलसिला क्रांतिकारी अशफाकउल्ला खां से लेकर परमवीर चक्र विजेता हवलदार अब्दुल हमीद और राष्ट्रवादी गुरू एपीजे अब्दुल कलाम तक यूं ही नहीं चला आ रहा है। हर नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए बिना भेदभाव कानून कहां तक जा सकता है ये याकूब को सजा-ए-मौत एक्जिक्यूट कर के कोर्ट ने बता दिया है। वहीं आजीवन राष्ट्र की सेवा से देश को दुनिया का सितारा और स्वयं को राष्ट्र की आंखों का तारा कैसे बनाया ये एपीजे अब्दुल कलाम ने सिखा दिया।

यकीनी तौर पर देश सहिष्णुता का महासागर है। इसलिए मुंबई में सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतारने के नापाक मददगार याकूब मेमन को फांसी के लिए देश ने 22 साल इंतजार किया। कानून की हर प्रक्रिया पूरा होने तक सब्र रखा। चालों के पेंच में कानून को उलझाने का जोखिम तक उठाया, लेकिन कहीं ऐसा नहीं हुआ कि तालिबान या अरब मुल्कों की तरह हाथों-हाथ क्रूरतम सजा के लिए लोग पगला उठे हों। जबकि सैकड़ों लाशों का मंजर कितना उकसा सकता है, इसकी कल्पना तो सहज की जा सकती है। मेमन ने मौत को चकमा देने के लिए हर संभव गली तलाशी। जिसके जवाब में कानून का मान रखने और संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट ने रात भर जाग कर दुनिया भर को बता दिया कि भारत का इंसाफ इतना दरियादिल है कि जघन्यतम हत्यारों को भी मौका देने में चूक नहीं करता है। साथ ही ऐलान ए मौत से बता दिया कि इतना मजबूत भी है कि तमाम दबाव के बाद भी सजा देने में मुरव्वत नहीं करता। कलाम की अंतिम विदाई पर आंसु और याकूब की फांसी पर सुकून के दो रंगों का संगम शंखनाद है कि इस देश में जाति या संप्रदाय की कालिख से क्लेष नहीं घोला जा सकता।

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