पुलिस को नहीं कानून का ज्ञान, कोर्ट में किरकिरी

On Date : 15 April, 2017, 3:28 PM
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सहकारिता के केसों में फटकार के बाद जागे अफसर
प्रशासनिक संवाददाता, भोपाल

सहकारी गृह निर्माण समितियों के अंदर हुई गड़बड़ियों के मामले में प्रदेश पुलिस का ज्ञान पर प्रदेश की दो अदालतों ने प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। दरअसल प्रदेश पुलिस और कुछ जांच एजेंसियां इस मामले में सहकारिता अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज करने की जगह आईपीसी की धाराओं में प्रकरण दर्ज कर रही है, जबकि एक्ट के मुताबिक सहकारी गृह निर्माण समितियों के अंदर हुई गड़बड़ियों का प्रकरण हाउसिंग सोसायटी एक्ट 1960 के तहत किया जाना चाहिए।
जबलपुर हाईकोर्ट और रीवा जिला कोर्ट द्वारा इस तरह के मामलों में दो अलग-अलग फैसले दिए गए हैं। इस फैसलों में पुलिस और जांच एजेंसियों ने आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धाराओं में एफआईआर दर्ज कर दी। जबकि नियमानुसार सहकारिता अधिनियम 1960 की विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की जाना चाहिए थी। अधिनियम के अनुसार रजिस्ट्रार की अनुमति के बाद ही एफआईआर और कोर्ट में चालान प्रस्तुत किया सकता है। सहकारिता अधिनियम की धाराओं का हवाला देते हुए ही हाईकोर्ट और रीवा कोर्ट ने सहकारी गृह निर्माण समिति के खिलाफ केस को खारिज कर दिया। दोनों मामले ईओडब्ल्यू के थे। एक मामला भोपाल का था, जबकि दूसरा मामला रीवा जिले का था। सहकारी गृह निर्माण समितियों के संचालकों द्वारा की गईं गड़बड़ियों की सैकड़ों एफआईआर प्रदेश के विभिन्न थानों में भी दर्ज हैं। कोर्ट के फैसले के बाद पुलिस मुख्यालय ने ऐसे मामलों में थानों से जानकारी जुटाना शुरू कर दी है। जिसमें विधिक सलाह लेकर कोई निर्णय लिया जा सके। संचालक मंडल के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार पंजीयक सहकारिता को है। जिसमें सहकारिता अधिनियम की धारा 74 के तहत कार्रवाई की जाना सुनिश्चित किया गया है। पंजीयक को अधिकार हैं कि वह जांच के बाद ही एफआईआर और अभियोजन की स्वीकृति प्रदान करेगा। जबकि थानों और जांच एजेंसियों ने सहकारिता अधिनियम की धारा 74 को नजरअंदाज कर आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 120 बी में एफआईआर दर्ज की हैं। एक्ट के अनुसार पुलिस और जांच एजेंसियां समिति के अंदर हुई गड़बड़ी की एफआईआर पंजीयक की अनुमति के बिना दर्ज नहीं कर सकती।
  सूत्रों की मानी जाए तो भोपाल और इंदौर में इस तरह के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में सोसायटी अधिनियम के अनुसार प्रकरण दर्ज नहीं किए गए हैं। पुलिस ने धोखाधड़ी का प्रकरण दर्ज किया है। ऐसे कई मामलों में पुलिस कोर्ट में चालान भी प्रस्तुत कर चुकी है।


प्रदेश में सहकारी समितियों में गड़बड़ियों की करीब 10 हजार से शिकायतें पुलिस के पास हैं। इनमें से आधे के करीब भोपाल और इंदौर जिलों में ही है।

जांच होगी धीमी
गृह निर्माण सहकारी समितियों में कई तरह के घपले-घोटालों की जांच चल रही है। अब इन जांच की गति धीमी हो सकती है। दरअसल अब पुलिस और जांच एजेंसियां इस मामले में नियमानुसार करेगी। इससे पहले उन्हें पुराने मामलों को देखना होगा कि कहीं उनके अलग धाराओं में मामला दर्ज करने से आरोपियों को लाभ तो नहीं मिल रहा। पुराने मामलों के कारण नए मामलों की जांच अब कछुआ चाल से होनी की आशंका है।

पेंडिंग मामलों में आएगा पसीना
कोर्ट में किरकिरी होने के बाद पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को इस तरह के पेडिंग मामलों की जांच में पसीना आ सकता है। जिन मामलों में प्रकरण दर्ज हो गया है, उन मामलों की अब रजिस्ट्रार से अनुमति लेना होगी। इसमें रजिस्ट्रार ने यदि कोई आपत्ति कर दी तो पुलिस को मामले में खात्मा लगाने की कार्रवाई करना होगी। ऐसे में पुलिस को परेशानी आ सकती है। इसका तोड़ निकालने के लिए विधि अफसरों की सलाह ली जा रही है।

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