सत्य की खोज : पुस्तक का उद्देश्य

On Date : 09 April, 2015, 1:30 PM
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इन शब्दों को पढ़ते हुए जरा शब्दों की बनावट पर गौर करिए। अपने इर्दगिर्द के माहौल के प्रति सतर्क हो जाइए। अपनी श्वांस की गति पर जरा नजर दौड़ाइये। जरा अपने विचारों को देखने का प्रयास कीजिए। कुछ देर के लिए वर्तमान के प्रति सजग हो जाइए। विचारों को देखिए। कोई विवेचना नहीं। कुछ देर रुकिए और वर्तमान को महसूस कीजिए।..........

जैसे ही आप वर्तमान के प्रति सजग होते हैं एक नवीन और बेहतर दुनिया आपके सामने होती है। आज के वक्त की सबसे बड़ी दिक्कत है मनुष्य का एक काल्पनिक दुनिया में जीना। वो जहां है उस पल को छोड़कर अपने विचारों से पूरी दुनिया का भ्रमण कर रहा है। वर्तमान के प्रति सजगता ही उसे सत्य जीवन के दर्शन करा सकती है। व्यव्हारिक जीवन में वह कई चुनौतियों को अपने समक्ष पाता है। इनमें चिंताएं, प्रतियोगितावादी संसार की भागदौड़, रिश्तों में कड़वाहट, और अधिक पाने की दौड़, अप्राप्त परिस्थिति का चिंतन प्रमुख हैं। इस पुस्तक में इन सभी विषयों पर प्रकाश डाल कर इनके कारण और निवारण पर विचार किया गया है। दुनिया में जितने भी सत्य को प्राप्त हुए लोग या संत दिखते हैं उनकी सत्य की खोज की विधियों में कोई अंतर नहीं था। सत्य की खोज का तरीका और सभी तरीकों में समानता पर भी इस पुस्तक में रौशनी डाली गई है। भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा युवा निवास करते हैं। युवा ऊर्जा को सकारात्मक रूप से पल्लवित किया जाएगा तो हमें एक सुखद भविष्य मिलेगा। स्वामी विवेकानंद का स्वप्न था कि भारत विश्व गुरू बने। वे इस बात पर भी जोर देते थे कि आध्यात्म हमारी जड़ों में है और हमें इसे नहीं छोड़ना चाहिए। व्यव्हारिक जगत में आध्यात्मिक सोच के साथ कैसे बढ़ा जाए, इस विषय पर भी ये पुस्तक एक समाधान प्रस्तुत करती है। आज आध्यात्म को अंधविश्वास की दुकान बनाया जा रहा है। बड़ी तादाद में लोग अनैतिक बाबाओं के दरवाजों पर जा रहे हैं। इसकी बड़ी वजह है उनकी आध्यात्म के प्रति श्रद्धा और बेहतर विकल्प का सामने नहीं होना। इसी देश ने विवेकानंद, शरणानंद और जे कृष्णमूर्ती जैसे वैज्ञानिक सोच रखने वाले क्रांतिकारी संत दिए हैं। सही मायनों में गीता का ज्ञान, योग या सत्य क्या है, इस पर भी इस पुस्तक में विचार किया गया है। काम, क्रोध, लोभ, अनासक्ति ये सारी बातें हम सुनते तो हैं, इनके शाब्दिक अर्थ भी जानते हैं, लेकिन जीवन में इनके व्यव्हारिक इस्तेमाल से हम अनभिज्ञ ही हैं। सरल भाषा और वर्तमान परिस्थितियों में इन विषयों पर प्रकाश डालने का भी प्रयास इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है। भाग्य को लेकर कई मान्यताएं हैं आखिर भाग्य क्या होता है और सत्य की खोज में इसका क्या योगदान है इस विषय पर भी सारगर्भित जानकारी इस पुस्तक के माध्यम से दी गई है।  अंत में निर्विचारता को प्राप्त कर वर्तमान में ही जीने की विभिन्न विधियों का विवेचन भी किया गया है। मन को काबू करना किसी मदमस्त हाथी को काबू करने से भी मुश्किल है एक बार उसे काबू कर लिया तो वर्तमान और आपके विचार आपकी मुठ्ठी में होते हैं। विचारो को काबू करने की असरदार विधियों पर भी इस पुस्तक में चर्चा की गई है।

 

1.    सत्य क्या है?
जो है सत्य ही है, सत्य की अनदेखी कर देना असत्य है। सत्य कहीं दूर नहीं है आपके भीतर ही है। आप ही सत्य का स्वरूप हैं। असत की मोटी चादर के नीचे कहीं सत्य की रोशनी दब जाती है। हम हमेशा उसके साथ रहते हैं लेकिन असत्य के आकर्षण हमें अपनी ओर खींचते रहते हैं। दुनिया में किसी भी मनुष्य को अगर सत्य मिला है तो वो एक ही जैसा है। सत्य का स्वरूप मेरे लिए कुछ है और आप के लिए कुछ और तो फिर वो सत्य रहा ही कहा। एक बात तो बहुत स्पष्ट है कि सत्य एक ही है और वो हम सबके लिए समान है। मानव जंगलों से निकलकर सभ्यता में जीने लगा। उसने अपने अनुशासन और समाज की रचना की। इंद्रिय सुख उसकी पहली अनुभूति थे वो इसकी अपेक्षा में नित नए प्रयोग करता गया। उसने खाने को परिष्कृत करने के साथ-साथ अपने जीवन को भी सुखमय बनाया। नित नए अविष्कारों से वो उन सभी कामों को संभव कर पाया जो उसके लिए असंभव से दिखते थे। अपने से ज्यादा शक्तिशाली जानवरों को अपने काबू में कर उसने उन्हें अपने कार्यों में लगा लिया। मनुष्य की इस अद्भुत शक्ति का कारण भी अब किसी से छिपा नहीं है। उसका मस्तिष्क, उसकी विवेकशीलता और जिज्ञासू प्रवृत्ति ने उसे आज जंगल से उठाकर सभ्यता में बसा दिया।

 

2.    सत्य की खोज की आवश्यक्ता
मानव जीवन मिलने के बाद से ही हम अपने अनुभवों के आधार पर अपने संस्कार और मान्यताएं बना लेते हैं। हमारे विचारों के आधार पर ही हमारा व्यक्तित्व निर्माण होता है फिर एक समय ऐसा आता है जब हम अपने स्वीकार किए हुए अस्तित्व और कुछ विचारों के इर्द गिर्द घूमते रहते हैं। ये प्रक्रिया हमें बहुत सीमित कर देती है जबकि मानव मन की शक्तियां असीमित है वो सत्य को प्राप्त कर सत्य में ही विलीन हो सकता है। हम सभी को उतना ही उत्तम जीवन मिल सकता है जितना कभी भी किसी भी मनुष्य को इस धरती पर मिला है। अपनी असीमित शक्तियों और मानव जीवन के महत्व को समझने के लिए सत्य की खोज की आवश्यक्ता है। इस आवश्यक्ता को अपने भीतर महसूस करने के लिए सबसे पहले कुछ प्रश्न स्वयं से पूछने होंगे। ये प्रश्न, इन पर मेरे और सत्य को प्राप्त हुए कई ज्ञानियों के विचार भी इस अध्याय में रखे जा रहे हैं। इस आवश्यक्ता को अपने भीतर महसूस करने के लिए स्वयं अनुसंधान करना जरूरी है। कई ज्ञानियों का मत है कि किसी अन्य के विचार आपके काम नही आ सकते हैं, लेकिन वे आपको एक दिशा तो दिखा ही सकते हैं। सभ्यता के विकास के साथ ही मानव मस्तिष्क में ये प्रश्न कौंध रहा है कि, मैं कौन हू? अपने अस्तित्व पर विचार करना आवश्यक है और आज हम इस पर बेहतर विचार करने की स्थिती में भी हैं। पूरी दुनिया में ईश्वर की सत्ता को अलग-अलग नामों से स्वीकार किया गया है, लेकिन उसका स्वरूप एक ही है। ईश्वर क्या है? ये भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। अपने और ईश्वर के अस्तित्व पर विचार करने के बाद हमें उन मार्गदर्शकों की भूमिका और आवश्यक्ता पर भी विचार करना जरूरी है जिन्हें हम संत, ज्ञानी या गुरू कहते हैं। सत्य की खोज की आवश्यक्ता अनुभव करने के लिए पहले इन तीन प्रश्नों पर विचार करते हैं।
2.1    आप ही सत्य हैं
2.2    ईश्वर भी सत्य ही है
2.3    सत्य के मार्गदर्शक

 

3.    सत्य की खोज के अभ्यास
कुछ देर का विराम लीजिए, जरा गौर से अपने आप को देखिए। अपने विचारों को, अपने चिंतन को अपने सपनों को हर चीज़ को महसूस करने का प्रयास कीजिए। आप आज जो कुछ भी है अपने जीवन भर किए अभ्यासों की वजह से हैं। जिस तरह का अभ्यास आप करते हैं वैसे ही आप बन जाते हैं। सर्कस में काम करने वालों के करतब देखकर आप आश्यर्यचकित हो जाते हैं क्यूंकि उन्होंने इसका अभ्यास किया है आपने नहीं। इसी तरह जिन्हें सत्य की प्राप्ति हुई उन्हें देखकर आप उन्हें ईश्वर मानते हैं क्यूंकि आपने सत्य को खोजने का अभ्यास नहीं किया और उन्होंने किया है। जब अभ्यास ही हर सफलता के मूल में है तो सत्य की खोज के लिए भी कुछ अभ्यास करने होंगे। पहले पहल ये अभ्यास सतर्कता के साथ करने होंगे लेकिन जैसे जैसे ये यात्रा आगे बढ़ेगी आप इसके अभ्यस्त हो जाएंगे और ये स्वतः ही आपके स्वभाव का हिस्सा बन जाएंगे। आप निरंतर जिन विचारों और कामों को दोहराते रहते हैं वे आपकी आदत बन जाते हैं। जरा विचार कीजिए अगर सत्य में जीना ही आदत बन जाए तो जीवन कितना आनंददायी होगा। ऐसे ही कुछ अभ्यासों को इस अध्याय में लिखा गया है। सर्वप्रथम हमें अभ्यास के स्वरूप और सही अभ्यास को समझना होगा। सत्य की खोज की शुरूआत ही सत्य के अभ्यास से होती है।
3.1    अभ्यास
3.2    सही अभ्यास
3.3    विश्राम का अभ्यास
3.4    विचारों को देखने का अभ्यास
3.5    इच्छाशक्ति मजबूत करने का अभ्यास
3.6    सीखने का अभ्यास
3.7    आत्मबल का अभ्यास
3.8    व्यव्हारिक ज्ञान का अभ्यास
3.9    एकाग्रता का अभ्यास
3.10    वर्तमान का अभ्यास
3.11    अपनेपन का अभ्यास
3.12    सतत अभ्यास का अभ्यास

 

4.    सत्य की खोज में बाधाएं
जीवन में किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति बिना बाधाओं को पार किए नहीं होती। असत् जगत में रहते रहते इससे प्रेम होना स्वभाविक भी है। सत्य की प्राप्ति हमें कहीं भागना नहीं सिखाती बल्कि हर जगह रमना सिखाती है। लोगों को बड़ा भय लगता है कि ये तो वैराग्य की बात है, सबकुछ खो जाएगा और यही मूर्खता सत्य की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। सत्य की खोज में कुछ खोता नहीं बल्कि जिसे भूलवश पराया मान बैठे थे वो भी अपना हो जाता है। दोस्त आप से दूर नहीं जाएंगे बल्कि जिन्हें भूलवश आप अपना दुश्मन मान बैठे है वे भी आपके प्रियजन हो जाएंगे। भेद का मिटना ही सत्य की प्राप्ति है और भेद मिटने से कभी कुछ खोता नहीं। इन्हीं बाधाओं के दूर होने के बाद एक स्पष्ट दृष्टि का प्रादुर्भाव होता है और ये दृष्टि आपको उस अलौकिक जीवन के दर्शन करवाती है जिससे आप अज्ञान की धुंधलाहट की वजह से देख नहीं पा रहे थे। सत्य की खोज में सबसे बड़ी बाधा तो असत्य से प्रेम ही है। जन्म से लेकर आज तक हमने असत्य का ही अभ्यास किया है। सत्य की प्यास हममें रही लेकिन उसकी ठीक-ठीक तस्वीर हम नहीं बना पा रहे थे। जैसे ही सत्य की खोज शुरू होती है ये धुंधलापन खुद ब खुद हटने लगता है और आप सारी बाधाओं को पार करते हुए सत्य की ओर अग्रसर होने लगते हैं। जिस तरह अंधकार का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता प्रकाश की अनुपस्तिथि ही अंधकार कहलाती है ठीक वैसे ही असत्य का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है सत्य की अनुपस्तिथि ही असत्य है। प्रकाश होते ही अंधकार का लोप हो जाता है, और सत्य की प्राप्ति के साथ ही असत्य का नाश हो जाता है।

4.1    असत्य का प्रेम
4.2    अंधविश्वास
4.3    आदर्श
4.4    दिखावा
4.5    दुर्व्यसनों
4.6    जलन
4.7    अपमान
4.8    सम्मान की चाह
4.9    क्या कहेंगे लोग
4.10    अधिकार
4.11    विचारों का ढेर
4.12    विचलन
4.13    टालमटोल

 

5.    सत्य की खोज के अस्त्र
मानव होने के नाते हमें मिली हर श्वांस बेहद कीमती है। ये श्वांस और उसके साथ चलता स्पंदन ही हमारा समय है। शक्तिशाली वर्तमान और इसमें जीवन ही सारी बाधाओं का समाधान है। जो वर्तमान की शक्ति पहचान लेता है वो व्यर्थ चिंतन से परे हो जाता है और जो व्यर्थ चिंतन से परे हो जाता है वो अपने मन पर काबू कर सत्य को पा लेता है। लक्ष्य उन्हीं को मिलते हैं जो व्यर्थचिंतन से परे होते हैं। आपको मिली प्राणऊर्जा और समय रूप श्वांस का सही इस्तेमाल ही सत्य की राह में आने वाली बाधाओं से लड़ने के सबसे बड़े अस्त्र हैं। मन को काबू करने के लिए मन के स्वरूप को समझना जरूरी है ऐसे ही शरीर रूपी मंदिर के महत्व को समझना भी आवश्यक है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास है और स्वस्थ मन में ही सत्य फलता फूलता है। जो सत्य की खोज में निकल भर पड़ता है वह भी दुनिया और समाज के लिए उपयोगी हो जाता है। जिसे सत्य मिल जाता है उसकी आवश्यक्ता तो समाज स्वयं महसूस करने लगता है। सत्य  की खोज के ये अस्त्र मानव को ईश्वरीय उपहार के तौर पर मिले हैं, लेकिन हममें से ज्यादातर लोग इनका उपयोग तो दूर की बात इन्हें पहचान भी नहीं पाते हैं। आइए हमें मिलें इन अस्त्रों को पहचानें और इनकी धार तेज करें।
5.1    मन
5.2    शरीर
5.3    संघर्ष
5.4    युवाशक्ति
5.5    तप
5.6    कल्पना
5.7    जिज्ञासा
5.8    सही सवाल
5.9    संवाद
5.10    कृतज्ञता
5.11    कल्पना
5.12    समय

 

6.    सत्य की खोज और गीता
भगवद् गीता को ईश्वर की वाणी के तौर पर सनातन परंपरा में स्वीकार किया जाता है। इसे धार्मिक ग्रंथ बनाकर किसी धर्म विशेष से जोड़ना उचित नहीं है। गीता तो सत्य की प्राप्ति के लिए किए गए तमाम शोधों का एक सर्वमान्य संकलन है। जिन्हें भी सत्य की प्राप्ति हुई है, वे चाहे किसी धर्म, देश या परिस्थिती में रहने वाले रहे हों उन्होंने गीता को अवश्य पढ़ा। इसके पीछे मुख्य कारण है गीता में सत्य को परिभाषित करना और योग के मानव जीवन का चरम लक्ष्य बताना। जीवन के सारे असत्य वे प्रियजन हैं जिनकी हत्या तो दूर हम उनपर हथियार भी नहीं उठाना चाहते हैं। योगस्वरूप किसी सद्गुरू का मार्गदर्शन मिले तो अपने अंतर्मन के इस युद्ध को हम जीत सकते हैं। अपने भीतर की ये लड़ाई सबसे घमासान युद्ध है इसमें बहुत सी अपनी लगने वाली चीजे छूटती हैं, लेकिन जब आप इस युद्ध को जीतते हैं तो समझ जाते हैं कि ना कुछ खोया है न कुछ पाया है। सब वैसा ही बस भ्रमवश हम ये युद्ध अपने भीतर लड़ रहे थे। गीता के भाष्य हो चुके हैं मैं सत्य की खोज में उसके वे तीन श्लोक जिन्होंने मुझे प्रभावित किया उन्हें आपके सामने रख रहा हूं और वर्तमान परिस्थितियों और भाषा में उन पर अपने विचार भी रख रहा हूं।
6.1    काम
6.2    क्रोध
6.3    लोभ
6.4    अनासक्ति
6.5    भाग्य

 

7.    सत्य की कुंजी
सत्य की खोज में अब हम उस स्तर पर हैं जहां हम अपने अभ्यासों, बाधाओं और उनसे निपटने वाले अस्त्रों से वाकिफ हो गए हैं। सत्य की कुंजी इस संसार में एक ही है। निर्विचारता की अवस्था से ही हमें सत्य के दर्शन हो सकते हैं। अनंत को प्राप्त करने के लिए अंतहीन इच्छाओं और विचारों को काबू करना होगा। विचारों के वेग से परेशान अर्जुन को ये दुनिया का सबसे बड़ा कार्य लगा था। संयमित जीवन जीने वाले भी भटकाव वश सत्य की कुंजी को समझ नहीं पाते हैं। मैंने कई सात्विक लोगों को देखा है जो सात्विक भोजन करते हैं, दुर्व्यसनों से दूर रहते हैं, ईश्वर भजन भी करते हैं लेकिन सत्य से कोसों दूर दिखाई पड़ते हैं। वे लोग सत्य को पाना तो चाहते हैं लेकिन उन्हें उसकी कुंजी नहीं पता होती। सत्य की कुंजी ध्यान है। ध्यान हजारों विधियां उपस्थित हैं। आप किसी भी क्रिया से स्वयं को निर्विचारता की अवस्था में ले आईये वहीं ध्यान की एक नई प्रणाली बन जाएगी। आप ध्यान क्यूं करते हैं इस पर पहले विचार करना आवश्यक है। व्यर्थ चिंतन और अनर्गल विचारों पर काबू पाना हमें दुष्कर लगता है। अगर हम निर्विचारता का अभ्यास करें तो ये संभव है। कई छात्र अपने पढ़ाई में, कई कलाकार अपनी कलाओं में इसी ध्यान के माध्यम से नई ऊंचाइयों को पा लेते हैं। आप जो कर रहे हैं उसमें सत्य की ये कुंजी आपको सफलता दिलाएगी। यहां आप सत्य की खोज कर रहे हैं और उसमें भी सफलता के लिए आप ध्यान की शरण में जाइये।
7.1    निर्विचारता
7.2    इंद्रियां और विषय
7.3    भोग से स्वभाविक अरुचि
7.4    ध्यान की आवश्यक्ता
7.5    सदा निर्विचार की दशा ध्यान
7.6    ध्यान की परिभाषाएं और विधियां


 

8.    सत्य को पाने वाले और उनके अनुभव
सत्य हम सब में बीज रूप से मौजूद है लेकिन इसके पौधा बनने के लिए खाद, पानी और प्रकाश की आवश्यक्ता पड़ती है। बीज का गुण है वो धरती का सीना चीरकर पौधे के रूप में सामने आता ही है लेकिन उससे आवश्यक चीजें न मिलें तो वो यथावत पड़े-पड़े नष्ट हो जाता है। ज्ञानियों ने अपने अनुभव को लिपिबद्ध किया, अपने वचनों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया और बकायदा कुछ अनुशासन भी बना दिया, लेकिन फिर भी सब को इससे सत्य की प्राप्ति नहीं हुई। ये भी सच है कि सत्य की खोज जिन्होंने की उनके लिए खाद, पानी और प्रकाश के रूप में पूर्व में ज्ञानियों द्वारा दिए गए यही अनुभव सामने आए। गीता से तो कई ज्ञानियों ने अपने भीतर सत्य की खोज शुरू की, फिर भाषा और परिस्थितियों के परिवर्तन ने उसे बहुत लोगों की समझ से बाहर कर दिया। जिन ज्ञानियों को योग या सत्य की पहचान हुई उन्होंने अलग अलग कालों में सत्य की प्राप्ति के लिए नई परिस्थितियों में समझने वाले उपाय बताए। आज मानव सभ्यता ज्यादा परिष्कृत दिखाई पड़ती है लेकिन उस लिहाज से सत्य की खोज के तरीके परिष्कृत नहीं हो पाए। हम हवा में तो उड़ने लग गए लेकिन अपने भीतर की उड़ान और योग की अभिलाषा से दूर हो गए। वर्तमान दौर के कई ज्ञानियों ने सत्य की प्राप्ति की और अपने अनुभवों को साझा किया है। यूं तो सत्य की प्राप्ति करने वाले बहुत से ज्ञानी है लेकिन ईश्वर कृपा से मुझे जिन ज्ञानियों को जानने समझने का मौका मिल पाया उनके विषय में अपने विचार भी यहां लिख रहा हूं। सत्य की खोज अलग नहीं होती और सबका सत्य भी एक ही होता है बस उसके तरीके और अनुभूतियों में कुछ फर्क होता है। सत्य वहीं है जो कृष्ण, ईसा, बुद्ध, महावीर या कबीर को मिला। जो जितना पुराना होता जाता है वह उतना दैवीय बन जाता है। आज के युग के कई संत और ज्ञानी भी इसी श्रेणी के हैं जिनमें हम कई योगियों को रखते हैं ऐसे ही कुछ योगियों के जीवन और सत्य की खोज के उनके अनुभवों पर आइए रौशनी डालते हैं।
8.1    स्वामी विवेकानंद
8.2    स्वामी शरणानंद
8.3    परमहंस योगनंद
8.4    ओशो रजनीश
8.5    जे. कृष्णमूर्ती
8.6    एकहार्ट टोल
8.7    स्वामी गंगाराम

 

9.    सत्य की प्राप्ति
सत्य की प्राप्ति से ज्यादा इसे सत्य का अनुभव कहना ठीक होगा। सत्य की प्राप्ति इसीलिए नहीं कहा जा सकता क्यूंकि सत्य तो पहले से ही मौजूद है, बस उसे देखने की जरूरत है। उसे देखने के लिए वो दृष्टि चाहिए जो आपकी कल्पनाओं से रहित हो। सजगता और सतर्कता आते ही आपके विचारों पर लगाम लग जाती है और विचारों पर लगाम लगते ही आप कल्पनाजगत से निकल कर सत्य की दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं। सत्य के संसार में सबकुछ सत्य ही होता है। प्रश्न ये भी उठता है सत्य की प्राप्ति से क्या लाभ होगा? यूं तो लाभ और हानि से ऊपर उठकर सोचने का नाम ही सत्य है लेकिन सत्यान्वेषी के तौर पर वो स्थिती अभी नहीं आई है तब भी सत्य की प्राप्ति के फायदो पर विचार किया जा सकता है। सत्य के जगत में प्रवेश करते ही आध्यात्मिक विकास तो होता ही है आप भौतिक विकास को भी देख सकते हैं। निर्विचारता से विचारशीलता को बल मिलता है। हम व्यर्थ चिंतन से मुक्त होते हैं तो सार्थक चिंतन ही शेष रह जाते है। सत्य की खोज करते हुए ही एक योगवित दृष्टि का एहसास आपको होने लगता है और ये जगत ज्यादा सुंदर लगने लगता है। हर परिस्थिति को आप उससे ऊपर उठकर देख सकते हैं। किसी के भड़काने पर भी आप क्रोधित नहीं होते बल्कि सत्य की खोज करने वालों के जीवन में एक स्थिति ऐसी भी आती है कि लोगों को आपको की आवश्यक्ता महसूस होने लगती है। सत्य की खोज करने वालो का रूप इतना सुंदर और शांत हो जाता है कि वह अन्य लोगों को स्वतः ही आकर्षित करता है।

 

                                                                पुस्तक का उद्देश्य
इन शब्दों को पढ़ते हुए जरा शब्दों की बनावट पर गौर करिए। अपने इर्दगिर्द के माहौल के प्रति सतर्क हो जाइए। अपनी श्वांस की गति पर जरा नजर दौड़ाइये। जरा अपने विचारों को देखने का प्रयास कीजिए। कुछ देर के लिए वर्तमान के प्रति सजग हो जाइए। विचारों को देखिए। कोई विवेचना नहीं। कुछ देर रुकिए और वर्तमान को महसूस कीजिए।..........

जैसे ही आप वर्तमान के प्रति सजग होते हैं एक नवीन और बेहतर दुनिया आपके सामने होती है। आज के वक्त की सबसे बड़ी दिक्कत है मनुष्य का एक काल्पनिक दुनिया में जीना। वो जहां है उस पल को छोड़कर अपने विचारों से पूरी दुनिया का भ्रमण कर रहा है। वर्तमान के प्रति सजगता ही उसे सत्य जीवन के दर्शन करा सकती है। व्यव्हारिक जीवन में वह कई चुनौतियों को अपने समक्ष पाता है। इनमें चिंताएं, प्रतियोगितावादी संसार की भागदौड़, रिश्तों में कड़वाहट, और अधिक पाने की दौड़, अप्राप्त परिस्थिति का चिंतन प्रमुख हैं। इस पुस्तक में इन सभी विषयों पर प्रकाश डाल कर इनके कारण और निवारण पर विचार किया गया है। दुनिया में जितने भी सत्य को प्राप्त हुए लोग या संत दिखते हैं उनकी सत्य की खोज की विधियों में कोई अंतर नहीं था। सत्य की खोज का तरीका और सभी तरीकों में समानता पर भी इस पुस्तक में रौशनी डाली गई है। भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा युवा निवास करते हैं। युवा ऊर्जा को सकारात्मक रूप से पल्लवित किया जाएगा तो हमें एक सुखद भविष्य मिलेगा। स्वामी विवेकानंद का स्वप्न था कि भारत विश्व गुरू बने। वे इस बात पर भी जोर देते थे कि आध्यात्म हमारी जड़ों में है और हमें इसे नहीं छोड़ना चाहिए। व्यव्हारिक जगत में आध्यात्मिक सोच के साथ कैसे बढ़ा जाए, इस विषय पर भी ये पुस्तक एक समाधान प्रस्तुत करती है। आज आध्यात्म को अंधविश्वास की दुकान बनाया जा रहा है। बड़ी तादाद में लोग अनैतिक बाबाओं के दरवाजों पर जा रहे हैं। इसकी बड़ी वजह है उनकी आध्यात्म के प्रति श्रद्धा और बेहतर विकल्प का सामने नहीं होना। इसी देश ने विवेकानंद, शरणानंद और जे कृष्णमूर्ती जैसे वैज्ञानिक सोच रखने वाले क्रांतिकारी संत दिए हैं। सही मायनों में गीता का ज्ञान, योग या सत्य क्या है, इस पर भी इस पुस्तक में विचार किया गया है। काम, क्रोध, लोभ, अनासक्ति ये सारी बातें हम सुनते तो हैं, इनके शाब्दिक अर्थ भी जानते हैं, लेकिन जीवन में इनके व्यव्हारिक इस्तेमाल से हम अनभिज्ञ ही हैं। सरल भाषा और वर्तमान परिस्थितियों में इन विषयों पर प्रकाश डालने का भी प्रयास इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है। भाग्य को लेकर कई मान्यताएं हैं आखिर भाग्य क्या होता है और सत्य की खोज में इसका क्या योगदान है इस विषय पर भी सारगर्भित जानकारी इस पुस्तक के माध्यम से दी गई है।  अंत में निर्विचारता को प्राप्त कर वर्तमान में ही जीने की विभिन्न विधियों का विवेचन भी किया गया है। मन को काबू करना किसी मदमस्त हाथी को काबू करने से भी मुश्किल है एक बार उसे काबू कर लिया तो वर्तमान और आपके विचार आपकी मुठ्ठी में होते हैं। विचारो को काबू करने की असरदार विधियों पर भी इस पुस्तक में चर्चा की गई है।


सत्य की खोज
सत्य की खोज इसलिए आवश्यक है क्यूंकि सत्य ही जीवन है। आप सत्य की खोज की आवश्यक्ता महसूस नहीं करते तो आप जीवन से ही विमुख हैं। मानव जीवन बहुमूल्य है क्योंकि उसमें विवेक का प्रकाश है। मानव और पशु में भोग के विषय में तो समानता दिखाई देती है लेकिन ज्ञान के विषय में वह पशु से बेहतर है। जो मनुष्य सिर्फ भोग का जीवन जी रहा है वह इस अंतर को समझ नहीं पाया है। जो विवेक की शक्ति को समझ गया है वो सत्य की खोज में है और सत्य उसे अवश्य मिलेगा।
डॉ. प्रवीण तिवारी विगत 16 वर्षों से टीवी और प्रिंट पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। वे स्वयं एक सत्यान्वेषी है और आध्यात्मिक विषयों पर सतत लेखन कर रहे हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं में उनके कॉलम सतत प्रकाशित होते हैं। वे नाद ब्रह्म योग धाम संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं और देश भर में नाद ब्रह्म की ध्यान विधि पर जागरूकता फैलाने का कार्य भी कर रहे हैं। सेवादीप फाउंडेशन के जरिए वे देश के युवाओं और बच्चों को प्रेरित करने के लिए भी सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। आप उनसे drpsawakening@gmail.com के जरिए संपर्क कर सकते हैं।

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