चढ़ा सियासी रंंग, फीका पड़ गया भगोरिया पर्व

On Date : 12 March, 2017, 4:05 PM
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पर्यटन विकास निगम ने भी प्रचार से हाथ खींचा
संजय त्रिपाठी, इंदौर :
फागुन मास में इंदौर संभाग के आदिवासी अंचलों में होने वाला प्रमुख त्यौहार भगोरिया अब सियासी रंग में डूबने लगा है। राजनीति के हस्तक्षेप के चलते अंचल की खुशबू और संस्कृति के रंग फीके होते जा रहे हैं। मेले की क्षीणे होती रंगत से न केवल आदिवासी समाज बल्कि उत्सव के आनंद में डूबने वाले पूरे संभाग के लोग दुखी हैं।  खास बात यह है कि पिछले आठ सालों से पर्यटन विकास निगम भी भगोरिया के प्रचार प्रसार में जुटा था पर इस साल निगम ने भी अपने हाथ इस मेले से खींच लिए। बहरहाल झाबुआ,अलीराजपुर, धार और बड़वानी जिले में भगोरिया का आगाज पारम्परिक रूप से हो गया। पेटलावद और रंभापुर से मेले की शुरुआत में वैसी रंगत नजर नहीं आई जिसके लिए भगोरिया जाना जाता है।

अंचल का सबसे बडा मेला अलिराजपुर जिले के वालपुर का माना जाता है।  अलिराजपुर जिले से 35 किलोमीटर दूर स्थित है वालपुर। छोटी बड़ी पहाडियों से घिरा वनांचल का यह गांव प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज है। तय समय से पहले ही जिला मुख्यालय से लेकर आसपास के गांवों तक से लोग वालपुर पहुंचाने लगे थे। अंचल का प्रमुक परिवहन जीप ही है सात सीटर गांडी में 25 लोग बिना शिकायत सफर कर लेते हैं, हां परिवहन विभाग की कुछ बसे भी है जो गिने चुने फैरे लगाती है, यह भी ठसाठस भरी होती है। इसके अलावा निजी दोपहिया वाहनों पर पूरे परिवार को लाद कर मेले में पहुंचने वाले भी कम नहीं थे। पूरे मार्ग पर ऐसे ही रंगीन नजारे बिखरे हुए थे।

सुबह से गूंजने लगी मांदल की आवाज
कुछ हवाओं का सरूर कुछ त्यौहार की मस्ती, टेसू और पलाश के फूलों की रंगत इन सब पर भारी ताड़ के पेड़ों पर टंगी वो मटकियां जिन में ताजी ताड़ी भरी हुई थे। गांव के बाहर पार्किग स्थल से कुछ ही दूरी से मेला क्षेत्र शुरू हो गया। पैदल-पैदल वनवासियों की टोलियां नाचते गाते बढ़ने लगी। ग्रामीणों के रैले में आम शहरी भी उसी रंग में रंग गया था। मेले की खुमारी चारों और छाई हुई थी।

शहरों की लग गई हवा
जैसे जैसे वालपुर करीब आता जा रहा था मांदल की गंजू भी तेज होती जा रही थी। पारम्परिक भेषभूषा में टोलियां मांदल की थाप पर नाचते गाते मेला परिसर की और बढ़ती जा रही थी। हा पहनावे में बदलाव बहुत हो गया है। इसे शहरों की हवा का नाम भी दे सकते हंै। हाथों में मोबाईल फोन लिए युवा जींस टी-शर्ट में नजर आ रहे थे। स्पाईक्स हेयर स्टाईल वाले इन युवाओं को देख अचरज भी हो रहा था। वहीं आदिवासी बालाएं भी पारम्परिक लुगड़े से लहंगा चोली पर आ चुकी है। जेवरों का स्वरूप ज्यादा नहीं बदला वही पुराना अंदाज कायम है। बहरहाल मेले के स्वरुप में ज्यादा बदलाव नजर नहीं आया। वही अस्थाई फोटो स्टूडियो, झूले चकरी मेले में आने वाले अंचल के लोगों के लिए खास आकर्षण का केंद्र थे। मिर्च के भजिए, आलूबड़े की खुशबू मेले को महका रही थी। हां अंचल की एक खास डीश और है, उडद की दाल के बड़े और बेसन का रेलमा जिसे हम लोग चीले भी कहते है। शहरी लोगों की बढ़ती तादाद के चलते इस चीले का एक नाम बेसन का आमलेट भी हो गया है। गुड़ की जलेबी, मिठी बूंदी, दूध वाली कुल्फी, पान की भी दुकाने मेले में सजी हुई थी। होली की एक खास मिठाई और है शक्कर के जेवर, लोगों में इसकों लेकर खास आकर्षण रहता है। शक्कर के कंगन और हार होली की विशेष परम्परा है, पहनों भी और खाओं भी। एक खास चीज जिसके प्रति शहरों में इन दिनों ज्यादा आकर्षण है वह है टेटू। वनांचल के मेले में टेटू बनवाने की एक खास प्रथा है। इसे देख कर हम कह सकते हैं कि टेटू बनवाने की प्रथा हमारी पुरानी परम्परा है।

सियासतदार भी कम जिम्मेदार नहीं
इस रंगीन लोकोत्सव की मस्ती को कम करने में सियासतदार भी कम नहीं है। अपनी अपनी राजनीति को चमकाने का जरिया उन्होंने भगोरिया को बना लिया है। स्थानीय नेता इस बहाने जनसंपर्क कर लेते है तो लगे हाथ शक्ति प्रदर्शन भी हो जाता है। अंचल के भोले भाले बाशिंदे तो नेताओं से हाथ मिलाकर ही खुश हो जाते हैं। कही कोई कमी रह भी जाती है तो इन्ही सियासतदारों के खादिम ताड़ी के केन हर टोले और मजरे में भेज कर उपक्रत कर देते हैं।

घाटे के कारण पीछे हटा निगम
भगोरिया की परम्परा अंचल की विशेष पहचान है। अपराधों के डर ने लंबे समय तक इस लोक पर्व से अन्य समाजों और शहरों को दूर रखा। पर्यटन विकास निगम ने पिछले आठ सालों में भगोरिया को काफी प्रचारित किया। स्वीस टेंट और निजी होटलों में बेहतर व्यवस्था के साथ देशी ही नहीं विदेशी पर्यटकों को भी अंचल से जोड़ने का प्रयास किया था। लगातार हो रहे घाटे के कारण पर्यटन निगम ने भगोरिया से दूरी बना ली। इस साल ना तो मेले का प्रचार किया और ना ही टूरिस्ट केलेंडर में मेले को जोड़ा गया है।यह बहुत अखरने वाली बात है कि सिर्फ लाभ प्राप्त करना ही निगम का उद्देश्य रह गया है, जबकि लोक पर्व को लोकप्रिय बनाना उनकी प्राथमिकता होना चाहिए था।

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