ऋषि परंपरा के अद्भुत नेता

On Date : 24 December, 2014, 3:12 PM
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भारतीय राजनीति के दैदीप्यमान नक्षत्र अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ मिलना ऋषि परंपरा के राजनेता का सम्मान है। देश के हृदय प्रदेश - मध्यप्रदेश का सीना आज अपने सपूत के सम्मान से और चौड़ा हो गया है। ग्वालियर में जन्मे और पले-बढ़े अटल जी भारतीय राजनीति के सूर्य की तरह हैं। राजनीति की बारहखड़ी सीखने के लिए उन्हें पं. दीनदयाल उपाध्याय के सानिध्य का सौभाग्य मिला। एकात्म मानववाद को आत्मसात करके अटलजी राजनीति में सादगी और समन्वय का पर्याय बन गए। कांग्रेस के अबाध राज में दशकों तक विपक्ष में रहकर सत्ता की लालसा से परे रहने का हिमालयी धैर्य सिर्फ अटलजी के बूते की ही बात थी। सत्ता के प्रति विदेह जैसा भाव विपक्ष में रहकर अटलजी ने निर्वाह किया वैसा ही तीन बार प्रधानमंत्री बनकर भी रहा। राजनीति की काजल-कोठरी में पूरा जीवन रहकर भी आज तक बेदाग हैं। सियासत की चदरिया ज्यों की त्यों धर दीनी। पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने जब युवा अटलबिहारी वाजपेयी को भविष्य की भारतीय राजनीति का चमकता हुआ सितारा बताया था तब कौन जानता था कि आने वाले समय में अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति के सबसे उजले हस्ताक्षर होंगे। अटलजी को ‘भारत रत्न’ पं. नेहरू की उस दूरदृष्टि पर मोहर लगाने का ही एलान हैं। एक साधारण कार्यकर्ता से प्रधानमंत्री की आसंदी तक कंटकाकीर्ण मार्ग जिस ईमानदारी से अटल जी ने तय किया उसका दूसरा उदाहरण मिलना दुर्लभ ही है। सांसद, नेता प्रतिपक्ष, विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में अपनी हर भूमिका वे ऐसे निभाते रहे मानो वे इसी के लिए बने हैं। राजनीति में पदार्पण से पहले वे पत्रकार रहे। पत्रकारिता के दौर में मिले हिन्दी के प्रति समर्पण को निभाने में वे हमेशा तत्पर रहते हैं। संयुक्त राष्टÑ संघ में भारत के प्रतिनिधि के तौर पर हिन्दी में दिया गया उनका भाषण इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा है। ओजस्वी वक्ता अटलजी के भीतर एक कोमल हृदय कवि भी धड़कता है। राजनीति के झंझावतों और उसकी दुरभि संधियां ‘कवि’ अटल बिहारी को छू भी नहीं पार्इं। आज भारत के राष्टÑपति प्रणव मुखर्जी ने जब ट्वीट कर अटलजी को भारत रत्न दिए जाने की घोषण की तो ऐसा लगा कि ‘भारत रत्न’ आज सचमुच खुद पर नाज कर रहा होगा कि उसे अटलजी जैसा भारत माता का सच्चा सपूत मिला।

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