सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का किया गया सफल परीक्षण

On Date : 22 March, 2018, 2:26 PM
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जयपुर: भारत ने सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का कामयाब परीक्षण किया है. यह परीक्षण गुरुवार (22 मार्च) सुबह राजस्थान के पोखरण परीक्षण केंद्र में किया गया. ब्रह्मोस रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और रूस के एनपीओएम का एक संयुक्त उपक्रम है. जमीन पर मार करने वाली ब्रह्मोस मिसाइल का संस्करण भारतीय सेना में 2007 से संचालन अवस्था में है. ब्रह्मोस ब्लॉक-3 रूस-भारत की एक संयुक्त परियोजना है, जो रूस के पी-800 ओनिक्स मिसाइल पर आधारित है. इससे पहले भारतीय सेना ने बीते साल 3 मई को ब्रह्मोस ब्लॉक3 जमीन आधारित क्रूज मिसाइल का अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में सफल परीक्षण किया था.

क्रूज मिसाइल का परीक्षण 2 मई, 2017 को भी किया गया था. सेना ने कहा था कि मिसाइल ने कॉपीबुक तरीके से सभी उड़ान मापदंडों को पूरा करते हुए सटीकता के साथ सफलतापूर्वक लक्ष्य पर हमला किया. यह लगातार पांचवां मौका था, जब ब्रह्मोस के ब्लॉक-3 संस्करण का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया. सेना के मुताबिक भूमि पर हमला करने के मामले में इसकी श्रेणी के किसी अन्य हथियार ने अभी तक यह अविश्वसनीय उपलब्धि हासिल नहीं की है. रक्षा बयान के मुताबिक, "लगातार सफलतम परीक्षण ने दुर्जेय हथियारों से मार करने की देश की क्षमता को और मजबूत किया है. 2 मई, 2017 को इसी स्थान से लंबी-दूरी तक मार करने वाले सामरिक हथियारों का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया था."

बीते साल 22 नवंबर को भारत ने वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण कर रिकॉर्ड कायम किया था. ब्रह्मोस ने बंगाल की खाड़ी में अपने समुद्री लक्ष्य को सफलतापूर्वक भेदा. यह हवा से लक्ष्य भेदने का मिसाइल का पहला परीक्षण था. रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि विश्व का सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस अब जमीन, समुद्र और हवा से मार करने में सक्षम है. बयान के अनुसार, "ब्रह्मोस ने 22 नवंबर को भारतीय वायुसेना के युद्धक विमान सुखोई-30एमकेआई से बंगाल की खाड़ी में अपने समुद्री लक्ष्य को भेद कर इतिहास रच दिया.

टाइटेनियम एयरफ्रेम और मजूबत एल्यूमिनियम मिश्र धातु की बनावट की वजह से एसयू-30 को ब्रह्मोस मिसाइल के लिए सबसे उपयुक्त युद्धक विमान माना जाता है. इस विमान का एयरोडायनेमिक समाकृति विमान की लिफ्टिंग प्रभाव की क्षमता को बढ़ाता है और इससे ऊंचे कोण से स्वत: हमला किया जा सकता है.

यह मिसाइल 500 से 14,000 मीटर की ऊंचाई से छोड़ी जा सकती है. मिसाइल छोड़े जाने के बाद यह 100 से 150 मीटर तक मुक्त रूप से नीचे आ सकती है और तब यह 14,000 मीटर में क्रूज फेज में प्रवेश कर सकती है और अंत में इसके बाद यह 15 मीटर में टर्मिनल फेज में प्रवेश कर सकती है. हवा में मार करने वाले ब्रह्मोस को इसके समुद्र व जमीन से मार करने वाले ब्रह्मोस से हल्का बनाया गया है.

भारत और रूस के संयुक्त रूप से तैयार की गई सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल का उन्नत संस्करण तैयार किया जा रहा है जो अपने लक्ष्य को भेदकर वापस आ जाएगी और फिर से इस्तेमाल की जा सकेगी. ब्रह्मोस मिसाइल प्रोजेक्ट के संस्थापक सीईओ और एमडी रहे डॉ. ए एस पिल्लई ने कहा कि इस दिशा में काम किया जा रहा है कि भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र की तरह ब्रह्मोस-2 अपने लक्ष्य पर निशाना साधकर वापस लौट आये और इसे पुन: प्रयोग भी किया जा सके.

पद्मभूषण से सम्मानित डॉ. पिल्लई 1 नवंबर, 2017 को मथुरा में दिल्ली-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग स्थित जीएलए विश्वविद्यालय के छठे दीक्षांत समारोह में आये थे. उन्होंने कहा, ‘सुपरसोनिक प्रक्षेपास्त्र के बाद भारत हाइपरसोनिक प्रक्षेपास्त्र विकसित कर रहा है. जो उससे भी 9 गुना ज्यादा शक्तिशाली होगा. इसे किसी भी खोजी उपकरण से पकड़ा भी नहीं जा सकेगा. वैज्ञानिक प्रयास कर रहे हैं कि यह प्रक्षेपास्त्र एक बार लक्ष्यभेद करने के बाद पुनः उपयोग में लाया जा सके.’

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