गांधी के गुजरात और कांग्रेस के गांधी का द्वंद्व

On Date : 02 October, 2013, 2:40 PM
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आज 2 अक्टुबर है गांधी जयंती। महात्माजी की 145वीं जयंती के दिन देश की यूपीए -2 सरकार दागी नेताओं के संबंध में जारी अपने अध्यादेश के बारे में पुनर्विचार करने वाली है। राजनीति में शुद्धता और शुचिता क ा तकाजा है कि सत्ता में गंदगी को रोकने के लिए फिल्टर लगें। दिलचस्प है कि लोकतंत्र में सड़ांध के विरुद्ध संघर्ष की धूरी गांधी के गुजरात और कांगे्रस के युवा गांधी  के आस पास ही घूम रही है। गांधी प्रतीकात्मक है, क्योंकि कांगे्रस और गुजरात, दोनों से उनका जुड़ाव रहा है। गुजरात  इसलिए कि भाजपा ने मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री और गुजरात को रोल मॉडल के रूप में जनता के सामने पेश किया है,

जबकि कांग्रेस के युवा गांधी राहुल मोदी के मुकाबले  मैदान में हैं। अभी तक यह मुकाबला आरोप-प्रत्यारोपों की परंपरागत  रणनीति की नुमाइंदगी ही कर रहा था, जिसमें निश्चित ही लच्छेदार व्यक्तित्व के मालिक मोदी भारी थे। कांग्रेस डिफेंस में थी। वैसे चुनावी लड़ाइयों में कांग्रेस,भाजपा सहित सभी  दल दोहरा बर्ताव करते हैं। राजनेता मानते हैं कि राजनीति का एकमात्र  सच और सत  वही हैं, उनके अलावा सब कुछ झूठ और भ्रष्ट है। लेकिन अब परिस्थितियां बदली हैं। लोग अपेक्षा करते हैं कि नेताओं को, चाहे वो मोदी हों या राहुल, सोनिया हों या सुषमा, पारदर्शी होना चाहिेए। यह परिवर्तन दिशा सूचक है। 

            
पिछले दो-तीन महीनों में, राजनीति से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने देश की इस फिजा को बदल दिया है। 17 साल के लंबे मुकदमे के बाद देश के प्रमुख राजनेता लालू यादव को जेल जाना पड़ा तो अगले ही दिन कोेर्ट ने एक और सांसद पूर्व मंत्री राशिद मसूद को 4 साल की सजा सुना दी। ये फैसले उम्मीद जगाते हैं कि सब कुछ भ्रष्ट नहीं हैं। फिर भी घटनाओं में परिलक्षित राजनीतिक विरोधाभास दर्शाते हैं कि भ्रष्टाचार से लड़ाई आसान नहीं है। नेताओं के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद यह सवाल अभी जिंदा है कि देश में राजनीतिक शुचिता और शुद्धता कितनी और कैसे आकार ले पाएगी? भले ही सुप्रीम कोर्ट बिगड़ैल राजनीति को नापने के लिए कटिबद्ध हो,लेकिन कांग्रेस,भाजपा, सपा, बसपा सहित सभी दल चाहते हैं कि फैसले को नरम करना चाहिए।


राजनेता गेंद को कांग्रेस के पाले में डाल कर चतुराई से अपना गेम-प्लान क ो अंजाम दे रहे थे। राहुल गांधी के विरोध के कारण राजनीतिक दांव पेंच का संतुलन गड़बड़ा गया।  दलों के अघोषित एजेंडे के खिलाफ राहुल की तल्ख प्रतिक्रिया ने माहौल एकदम बदल दिया है। राजनीति में दागी और बेईमान रास्तों के  समर्थन और दोहरे बर्ताव की गुंजाईश अब नहीं बची है। भाजपा यदि इससे खुश है कि लालू यादव के जेल में बंद होने का लाभ मिलेगा तो उसे यह जवाब भी देना पड़ेगा कि मोदी की कैबिनेट के सजायाफ्ता खनिज मंत्री बाबूभाई बोखिरीया अब तक पद पर क्यों बने हुए हैं? पिछले दिनों जिस तरीके से मोदी ने यूपीए सरकार के खिलाफ सवालों का चक्रव्यूह खड़ा किया है लगभग उतने ही पैने सवालों के चक्रव्यूह से वो भी घिरे हैं।
गांधी जयंती के एक दिन पहले गांधी के गुजरात में  मोदी- सरकार ने राज्यपाल के संशोधनों और सुझावों को दरकिनार कर जिस तरीके से लोकायुक्त बिल पारित किया है वह अपने आप में गौरतलब है। इस अधिनियम में गुजरात के उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस की भूमिका को लगभग समाप्त कर दिया गया है। गुजरात में मुख्यमंत्री के कठपुतली  लोकायुक्त संगठन की स्थापना  सवाल खड़े करती है कि भ्रष्टाचार की लड़ाई के खिलाफ मोदी और उनकी भाजपा कितनी संजीदा है? इसकी तुलना में कांग्रेस के गांधी राहुल ने अपनी ही सरकार द्वारा जारी अध्यादेश का विरोध करके जता दिया है कि राजनीति में शुद्धिकरण के बारे में उनके मंसूबे क्या हैं? राहुल गांधी की यह स्वीकारोक्ति  साहसिक  है कि मेरे संगठन के लोग इस अध्यादेश के संदर्भ में कहते हैं कि ‘राजनीतिक बाध्यताओं के कारण हमें यह करना पड़ रहा है। सब यही कर रहे हैं, कांग्रेस भी यह करती है,

और भाजपा भी  यही करती है। समाजवादी पार्टी और जेडीयू भी यह कर रहे हंै।’‘अब वह वक्त आ गया है जब सभी राजनीतिक दलों को, चाहे वह मेरा हो या दूसरों का, इस ‘नॉनसेंस’ को  रोकना होगा। यदि हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना है, चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा, हम ऐसे छोटे-छोटे समझौते नहीं कर सकते। यदि हम ये छोटे-छोटे समझौते करेंगे तो हर जगह ऐसे ही समझौते करते जाएंगे।’
राहुल के इस विरोध में जो दृढ़ता है, उसमें युवा पीढ़ी का आक्रोश है। युवकोचित दुस्साहस है और अपनी पार्टी के साथ-साथ अन्य सभी राजनीतिक दलों के गंदे अंतप्रवाहों को चुनौती भी है। देश में कांग्रेस के इस युवा गांधी का आक्रोश गांधी के उस गुजरात की नैतिकताओं को चुनौती दे रहा है जिसे भारतीय जनता पार्टी अपना रोल मॉडल बना कर देश में प्रदर्शित कर रही है। परिपक्व, लच्छेदार, घुमावदार भाषणों की भाषा तभी विश्वसनीय होती है जबकि वह तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर खरी हो। लोग इस प्रकार के प्रस्तुतिकरण से उबने भी लगते हैं। इसकी तुलना में सीधा सपाट सच कई मर्तबा ज्यादा प्रभावी सिद्ध होता है। सभी राजनीतिक दलों को देश के तरुणाई की इस मानसिकता को गंभीरता से लेना होगा।

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