लोकतंत्र की धमनियों में जमा चर्बी का इलाज

On Date : 27 September, 2013, 1:54 PM
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लोकसभा और विधानसभा चुनाव में ‘निगेटिव वोटिंग’ का अधिकार मतदाताओं को मिले या न मिले, यह पिछले साठ सालों से देश में बहस का विषय रहा है। आज सुप्रीम कोर्ट ने निगेटिव वोटिंग के वजूद को एक राजनीतिक सच्चाई में तब्दील करके ऐतिहासिक फैसला किया है। निगेटिव वोटिंग का अधिकार अभी तक सिर्फ शब्दों की इबारत में हाशिए पर रखा एक सैद्धांतिक विचार था। अब इस सिद्धांत का व्यवहार में अमल हो पाएगा। लेकिन इसके व्यवहारिक अमल में पेचीदगियां भी कम नहीं हैं। हमारे लोकतंत्र की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विषमताएं एक कड़वा सच है। और कड़वी सच्चाई यह है कि पिछले साठ सालों में संसदीय लोकतंत्र की फजीहत का सिलसिला आज अपने चरम पर है। इस फजीहत के लिए सभी राजनीतिक दलों के सूत्रधार समान रूप से जिम्मेदार हैं। लोकतंत्र की संसदीय धमनियो में राजनीतिक व्यवस्थाओं का शुद्ध रक्त बहे, यह सदिच्छा सब लोग व्यक्त करते रहे हैं। लेकिन नेताओं के गैरकानूूनी और गैरवाजिब राजनीतिक कारगुजारियों के ‘कॉलेस्ट्रोल’ ने इसकी धमनियों में इतनी चर्बी जमा कर दी है कि लोकतंत्र का सांस लेना दूभर हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लोकतंत्र के स्वास्थ्य को और ज्यादा बिगड़ने से रोकेगा। हाल ही में सजायाफ्ता नेताओं के संबंध में फैसला लेकर लोकतंत्र की शुद्धता के लिए जो कदम बढ़ाए थे, मतदाताओं के निगेटिव वोटिंग के अधिकार को जिंदा करके उसने यह संकेत दिए हैं कि चुनाव सुधार देश के लिए अपरिहार्य है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अब हर वोटर के सामने यह विकल्प खुला रहेगा कि वो बगैर किसी कानूनी प्रक्रियाओं के निगेटिव वोटिंग के अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सके। अभी तक चुनावी नियमों में धारा 49 (ओ) के तहत यह प्रावधान था कि कोई भी मतदाता रिटर्निंग आॅफिसर से संबंधित फॉर्म लेकर निगेटिव वोटिंग के अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकता था। इस प्रक्रिया के तहत आवेदन देने वाले व्यक्ति का बकायदा रजिस्टर में नाम भी नोट होता था। समझा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया का सरलीकरण करते हुए ईवीएम में ही इस विकल्प को रखने के निर्देश दिए हैं। कोई भी सकारात्मक निर्णय तभी कारगर होता है जब उसका सही उपयोग हो। मौजूदा चुनावी व्यवस्था में दबंगई के किस्से दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। वोटों की खरीद फरोख्त का प्रचलन राजनीति में आम हो चुका है। किसी भी चुनाव में खर्च के आंकड़े करोड़ों में पहुंचते हैं। मतदाताओं को मानसिक, बौद्धिक और सामाजिक तौर पर खुद को तैयार करना पड़ेगा कि उनका मताधिकार कोई खरीद न सके। निगेटिव वोटिंग का अधिकार लोकतंत्र में बढ़ती बेइमानियों के खिलाफ एक अलर्ट है। राजनीतिक दल इसे आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन अब उन्हें यह कड़वा घूंट पीना पड़ेगा कि उनकी निरंकुशता और बेईमानियों के दिन लद चुके हैं।

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