बीजिंग : दो दिवसीय शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई। पीएम ने अपने संबोधन में कहा कि हमारे (भारत-चीन) बेहतरीन संबंधों से दुनिया को शांति और स्थिरता मिल सकती है। बता दें कि प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति के यह मुलाकात एससीओ सम्मेलन के इतर हुई है।

Qingdao: Prime Minister Narendra Modi met Chinese President Xi Jinping. The two leaders also held a bilateral meeting. #China pic.twitter.com/fVGC0IFiAD

— ANI (@ANI) June 9, 2018

गौरतलब है कि पीएम मोदी बीते पांच हफ्तो में दूसरी बार चीन पहुंचे हैं। इससे पहले उन्होंने वुहान सम्मेलन के दौरान अप्रैल में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी। जिसमें दोनों नेताओं के बीच अनौपचारिक वार्ता हुई थी।

इस सम्मेलन में ईरान परमाणु समझौते के भविष्य सहित रूस के अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव और कई स्थितियों पर विचार-विमर्श करेंगे। इसके साथ ही भारत-प्रशांत क्षेत्र की स्थिति पर चर्चा की जाएगी।

मालूम हो कि यह पहली बार है जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री एससीओ) शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। भारत, चीन और रूस व उनके नजदीकी सहयोगी देशों पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान व उज्बेकिस्तान के शीर्ष नेता आज यहां शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए एकत्र हुए हैं। मोदी एससीओ देशों के नेताओं के साथ करीब आधा दर्जन से ज्यादा द्विपक्षीय बैठक करेंगे।


2001 में बना था एससीओ
- अप्रैल, 1996 में शंघाई में एक बैठक के दौरान चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान एक-दूसरे के नस्लीय और धार्मिक तनावों से निबटने के लिए सहयोग को सहमत हुए। इसे शंघाई फाइव कहा गया।

- जून, 2001 में शंघाई फाइव में उजबेकिस्तान भी शामिल हो गया। इसके बाद इसे शंघाई सहयोग संगठन नाम दिया गया। सदस्य देशों ने नस्लीय-धार्मिक चरमपंथ से निपटने के साथ ही व्यापार और निवेश बढ़ाने के लिए भी समझौता किया।

- 2005 में कजाकिस्तान के अस्तान में हुए सम्मेलन में भारत, ईरान, मंगोलिया और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने पहली बार हिस्सा लिया था।

- एससीओ ने संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, आसियान, कॉमनवेल्थ और इस्लामिक सहयोग संगठन से भी संबंध स्थापित किए हैं।

भारत को तीन साल लगे सदस्यता मिलने में
- भारत ने सितंबर, 2014 में शंघाई सहयोग संगठन की पूर्णकालिक सदस्यता के लिए आवेदन किया था।
- 2015 में रूस के उफा में एससीओ सम्मेलन हुआ। इसमें भारत-पाकिस्तान को पूर्णकालिक सदस्य के तौर पर शामिल करने का प्रस्ताव पारित हुआ।
- 2016 में उजबेकिस्तान के ताशकंद में हुए एसीओ सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान को शामिल करने के समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।
- जून, 2017 में भारत के साथ ही पाकिस्तान को भी संगठन की पूर्णकालिक सदस्यता मिल गई।


सहयोग संगठन का उद्देश्य
एससीओ एक राजनीतिक और सुरक्षा समूह है। इसका मुख्यालय बीजिंग में है। यह संगठन सदस्य देशों के बीच सैन्य सहयोग बढ़ाने के लिए बनाया गया है। इसमें खुफिया जानकारियों को साझा करना और मध्य एशिया में आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाना शामिल है।

आतंकवाद और चरमपंथ से लड़ने के लिए एससीओ का अपना तंत्र है। हालांकि, पश्चिमी मीडिया मानता है कि एससीओ का मुख्य उद्देश्य नाटो के बराबर खड़ा होना है। सुरक्षा सहयोग के साथ ही सदस्य देशों के बीच व्यापार और निवेश बढ़ाना भी एससीओ के उद्देश्यों में शामिल है।


कैसे इस्तेमाल कर सकता है भारत
एससीओ के उद्देश्यों में आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद से मुकाबला करना शामिल है। आतंकवाद भारत की प्रमुख चिंताओं में है। कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद और अलगाववाद को रोकने के लिए सदस्य देशों पर दबाव बना सकता है।

भारत एससीओ के मंच से पाकिस्तान की आतंकी नीतियों पर सीधा हमला कर सकता है। भारत रूस के साथ मिलकर आतंकवाद और सीपीईसी जैसे मुद्दों पर चीन और पाकिस्तान को घेर सकता है।

सदस्य देशों के बाजारों में पैठ बढ़ा सकता है। पाकिस्तान और चीन के साथ वर्षों से लंबित सीमा विवाद को सुलझा सकता है। मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कराने के लिए दबाव बना सकता है।


भारत के सामने कुछ आशंकाएं भी
एससीओ सदस्य के तौर पर भारत को कुछ नुकसान भी उठाने पड़ सकते हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के मसले पर भारत पर दबाव बनाया जा सकता है। मई, 2017 में भारत ने बीजिंग में आयोजित ‘बेल्ट एंड रोड फोरम’ में भाग लेने से इनकार कर दिया था।

भारत ने परियोजना को अपनी संप्रभुता का हनन बताया था। अब चीन ‘वन बेल्ट, वन रोड’ परियोजना को पूरा करने के लिये भारत पर दबाव डाल सकता है। कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद और अलगाववाद को रोकने के लिए चीन की ओर से पाकिस्तान पर किसी भी तरह का दबाव डालने की उम्मीद नहीं है।