अजीब दास्तां है ये, कहां शुरु कहां खतम, ये मंजिलें हैं कौनसी, न तुम समझ सके न हम। भय्यू महाराज ने खुदकुशी कर ली। जिसने सुना वो हतप्रभ। क्या कोई संत ऐसा फैसला ले सकता है।  इस पलायनवादी हादसे की वजह उनके परिवार में ही ढूंढी जा रही है। इस घटना पे भास्कर का प्रजेंटेशन दूसरे तमाम अखबारों से कहीं आगे रहा। तथ्य दूसरों के पास भी थे लेकिन खबर की भास्कराना अदा औरों से एकदम जुदा है। अंदर के सफे पे भी दूसरी पत्नी के दखल और बेटी से दूरी भी इस हादसे की वजह वाली खबर पूरी शिद्दत से आई। डरे समहें से रहते थे, दरवाजा टूटा तो आंखें फेरे पड़े दिखे और दस लाइन का सुसाइट नोट वाले बक्से खबर को मुकम्मल बना रहे हैं। सत्तर बरस बाद अमेरिका और उत्तर कोरिया के रिश्तों में जमी बर्फ पिघली।