नई दिल्‍ली: जेपी इंफ्राटेक से घर खरीदने वालों के लिए बुरी खबर है. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जयप्रकाश एसोसिएट के प्रमोटरों से कहा कि वह जेपी इंफ्राटेक के लिए बोली नहीं लगा सकते. जेपी इंफ्राटेक नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के समक्ष दिवाला कार्यवाही का सामना कर रही है. बोली के लिए जेपी एसोसिएट की याचिका को खारिज करते हुए सीजेआई दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ की पीठ ने एनसीएलटी को कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी.

180 दिन में निपटाएं मामला
पीठ ने कहा कि दिवालियापन संहिता के तहत मामले को निपाटने के लिए 180 दिन की समय सीमा गुरुवार से शुरू होगी. पीठ ने यह भी कहा है कि जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड द्वारा उच्चतम न्यायालय में जमा कराए गए 750 करोड़ रुपये एनसीएलटी की इलाहाबाद पीठ को हस्तांतरित कर दिए जाएंगे. शीर्ष अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को जेआईएल की होल्डिंग कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट लिमिटेड (जेएएल) के खिलाफ दिवालियापन कानून के तहत एक अलग से कार्रवाई शुरू करने की भी अनुमति दी.

घर खरीदार भी बनाए गए वित्तीय कर्जदाता
पीठ ने कहा कि कर्ज शोधन अक्षमता एवं दिवालियापन संहिता (आईबीसी) में किए गए संशोधनों के अनुसार घर खरीदने के लिए पैसा जमा कराने वाले ग्राहकों को भी वित्तीय ऋणदाताओं के समूह में शामिल किया जाए. पीठ ने उसके समक्ष लंबित सभी याचिकाओं एवं आवेदनों का निपटान किया. न्यायालय ने इससे पहले इस मामले में जेआईएल, जेएएल के ग्राहकों, बैंकों और वित्तीय संस्थानों समेत विभिन्न हितधारकों और दिवालियापन समाधान पेशेवर (आईआरपी) द्वारा मांगी गई 'अंतरिम राहत' पर सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था.

आईडीबीआई ने दाखिल किया था मामला
इस मामले में आईडीबीआई बैंक ने जेएएल के खिलाफ 526 करोड़ रुपये का कर्ज न चुकाने के आरोप में एसीएटी में दिवालियापन कानून के तहत निपटान का मामला दायर किया था. सहायक सालिसिटर जनरल ने शीर्ष अदालत में इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि चूंकि अब मकान खरीदने वाले ग्राहकों को भी दिवालियापन संहिता के तहत वित्तीय कर्जदाता माना गया है. इसलिए इस मामले के वित्तीय कर्जदाताओं (सामान्यत: वित्तीय संस्थान) की समित को समाधान योजना पर निर्णय करते समय ग्राहकों का पक्ष भी सुना जाना चाहिए.

ग्राहकों के वकील ने खारिज कर दी थी दलील
ग्राहकों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने जेएएल की इस दलील का विरोध किया था कि उसे आवास परियोजनाएं पूरा करने की छूट मिलनी चाहिए. उनका कहना था कि कानून के तहत कंपनी पर इसकी रोक लगी है. पीठ ने स्थिति की गंभीरता पर गौर करते हुए कहा कि कंपनी की देनदारी 2000 करोड़ रुपये की थी जो अब बढ़कर 30,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है. कंपनी ने कहा था कि उसने उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री में 750 करोड़ रुपये जमा करा रखे हैं और ग्रहकों का मूलधन चुकाने के लिए 600 करोड़ रुपये और चाहिए होंगे.

उसकी ओर से यह भी कहा कि यदि उसे उसकी कुछ चिह्नित परिसम्पत्तियों की बिक्री की इजाजत हो तो वह 600 करोड़ रुपये जमा करा सकती है. इन सम्पत्तियों में रीवा (मध्य प्रदेश) का एक सीमेंट कारखाना भी है. ग्राहक कंपनी के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में चले गए थे. उनका कहना था कि करीब 32000 लोगों ने कंपनी की परियोजनाओं में फ्लैट बुक कराए थे और वे अब किस्तें जमा कर रहे हैं.