भोपाल: मध्य प्रदेश में बीते 15 सालों से बीजेपी लगातार सत्ताधारी पार्टी बनी हुई है. वहीं, कांग्रेस इस वनवास को खत्म करने के लिए भरपूर कोशिश कर रही है. आपको बता दें कि कांग्रेस को सत्ता का यह वनवास एक साध्वी की वजह से भोगना पड़ा था. मध्य प्रदेश में कांग्रेस का यह अभी तक जारी वनवास साध्वी उमा भारती ने शुरू किया था. उमा भारती ने साल 2003 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को दो-तिहाई सीटें जिताकर मध्य प्रदेश में सत्ता सौंपी थी. बीजेपी ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के लिए साध्वी उमा भारती को प्रदेश में अपना चेहरा घोषित किया था.

इसके साथ ही बीजेपी नेतृत्व ने पूरे प्रदेश में 'राजा बनाम साध्वी' का नारा बुलंद कर दिया था. वहीं, मध्य प्रदेश के तात्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने चुनाव के समय घोषणा की थी कि अगर वो चुनाव हार गए, तो दस साल तक कोई पद नहीं लेंगे. बीजेपी नेतृत्व ने दिग्विजय की इस घोषणा को दिग्विजय सरकार की विफलता का पैमाना बनाते हुए पूरे प्रदेश में इसे प्रचारित किया था. सत्ताविरोधी लहर के बीच दिग्विजय की इस घोषणा ने उमा भारती के काम को और आसान बना दिया. उमा भारती ने मूलभूत मुद्दों (सड़क, बिजली, पानी) को चुनावी हथियार बनाकर राज्य में बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाया.

स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में तात्कालीन केंद्र सरकार के सभी बड़े नेताओं ने मध्य प्रदेश चुनाव में सत्ता बदलने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी. वहीं, सत्ताविरोधी लहर का सामना कर रही कांग्रेस की दिग्विजय सरकार के सामने बीजेपी ने उमा भारती को लाकर दोहरा दांव खेला था. पहला साध्वी का जन्म मध्य प्रदेश के ही टीकमगढ़ जिले में हुआ था. साथ ही वह रामजन्मभूमि आंदोलन की फायरब्रांड नेता थीं. दूसरा वह राज्य की राजनीति में बड़ा दखल रखने वाली आबादी का प्रतिनिधित्व भी करती थीं. उमा भारती ने दिग्विजय शासनकाल के 10 सालों में राज्य की बदहाली को मुख्य मुद्दा बनाया और विकास के नारे के साथ राज्य की सत्ता में प्रवेश किया.   

प्रदेश में राजा (दिग्विजय सिंह) का किला ढहाने के लिए वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी, सुषमा स्वराज समेत बीजेपी के कई कद्दावर नेताओं ने प्रदेश में चुनाव प्रचार की कमान संभाल रखी थी. साल 2003 के चुनाव में बीजेपी के नेताओं ने दिग्विजय सरकार की दस साल की विफलताओं को लगातार निशाने पर बनाए रखा. कांग्रेस की ओर से सोनिया गांधी समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने राज्य में सत्ता बचाने के प्रयास किए, लेकिन विफल रहे. चुनाव परिणाम आने पर बीजेपी ने उमा भारती के नेतृत्व में 173 सीट जीतकर दिग्विजय का किला ढहा दिया था. साथ ही राज्य में कांग्रेस को मात्र 37 सीटों पर समेट दिया था.