देश में बढ़ते प्रदूषण और ईंधन की ऊँची कीमतों के कारण इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की माँग बढ़ रही है, लेकिन महँगी बैटरी और आयात निर्भरता इसे मध्यम वर्ग की पहुँच से दूर रख रही है। 2024-25 में 41 लाख कारों में से मात्र 2.5% इलेक्ट्रिक थीं, जबकि दोपहिया और तिपहिया ईवी की माँग तेज़ी से बढ़ी है। सरकारी सब्सिडी और स्वदेशी बैटरी तकनीक से ही लागत कम हो सकती है, वरना उपभोक्ता हाइब्रिड और पारंपरिक वाहनों को तरजीह दे रहे हैं।
देशभर में बढ़ते प्रदूषण और ईंधन की आसमान छूती कीमतों ने लोगों का रुझान इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की ओर बढ़ाया है, लेकिन ऊँची लागत और बैटरी से जुड़ी समस्याएँ इस राह में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, इलेक्ट्रिक वाहनों का बाज़ार भले ही तेज़ी से बढ़ रहा हो, लेकिन आम उपभोक्ताओं के लिए ये अभी भी एक महँगा विकल्प हैं।आँकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में बिकने वाली 41 लाख से अधिक यात्री कारों में से केवल 1 लाख कारें ही इलेक्ट्रिक थीं, जो कुल बिक्री का मात्र 2.5% है। वहीं, दोपहिया और तिपहिया वाहनों में इलेक्ट्रिक विकल्पों की माँग में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। इसका कारण इन वाहनों की तुलनात्मक रूप से कम कीमत और उपयोगिता को माना जा रहा है।उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि बैटरी और अन्य महत्वपूर्ण कलपुर्जों के आयात पर निर्भरता लागत को बढ़ा रही है, जिसके चलते सस्ती इलेक्ट्रिक कारों की उपलब्धता सीमित है। कई कंपनियाँ अभी भी इस क्षेत्र में मुनाफ़ा कमाने के बजाय घाटा उठा रही हैं।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि बैटरी तकनीक में स्वदेशी नवाचार और उत्पादन बढ़ाने से ही कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है।केंद्र और राज्य सरकारें सब्सिडी, कर राहत और चार्जिंग ढाँचे के विस्तार जैसे कदमों के ज़रिए इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन दे रही हैं। हालाँकि, मध्यम वर्ग के लिए इलेक्ट्रिक कार अभी भी एक दूर का सपना बनी हुई है। नतीजतन, अधिकांश उपभोक्ता हाइब्रिड या पारंपरिक पेट्रोल-डीज़ल वाहनों को ही ज़्यादा भरोसेमंद और किफायती मान रहे हैं।