सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संदर्भ मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्यपालों को विधानसभा से पारित किसी भी बिल को अनिश्चितकाल तक रोककर रखने का कोई अधिकार नहीं है। उनके पास सिर्फ तीन विकल्प हैं—बिल को मंजूरी देना, राष्ट्रपति के पास भेजना या विधानसभा को पुनर्विचार के लिए लौटाना। बिल को बिना कोई कार्रवाई किए लटकाए रखना संवैधानिक रूप से गलत है।
पीठ ने हालांकि बिल पर फैसला करने की कोई निश्चित समय-सीमा तय करने की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 200 और 201 में जानबूझकर लचीलापन रखा गया है, इसलिए न तो अदालत और न ही विधायिका राज्यपाल या राष्ट्रपति पर कोई सख्त समय-सीमा थोप सकती है, वरना शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि राज्यपालों के पास विधानसभा से पास हुए बिलों पर एकतरफा रोक लगाने या उन्हें हमेशा के लिए रोककर रखने की शक्ति नहीं है। ऐसा करना भारतीय संघवाद के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा। यह मामला मूल रूप से तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच लंबित बिलों को लेकर उत्पन्न विवाद से जुड़ा था, जिसमें राज्यपाल ने कई बिलों को लंबे समय तक लटकाए रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से राज्यपालों की मनमानी पर लगाम लगाते हुए विधायी प्रक्रिया को और स्पष्ट बनाया है।