पश्चिम बंगाल में इन दिनों धार्मिक प्रतीकों के जरिए राजनीतिक ध्रुवीकरण का नया दौर शुरू हो गया है। मुर्शिदाबाद जिले में तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूँ कबीर ने बेलडांगा क्षेत्र में बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक नई मस्जिद का शिलान्यास किया, जिसने राज्य की सियासत में हलचल मचा दी है।
इस कदम को मालदा-मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम-बहुल इलाकों में अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वालों से समझौता नहीं किया जाएगा।
शनिवार 6 दिसंबर को बाबरी विध्वंस की बरसी पर तृणमूल कांग्रेस द्वारा मनाए जाने वाले ‘संहति दिवस’ के मौके पर ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “बंगाल टैगोर, नजरुल, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की भूमि है। यहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन सभी मिल-जुलकर रहते आए हैं। धर्म निजी है, लेकिन उत्सव सबके हैं। जो लोग नफरत की आग लगाना चाहते हैं, उनकी हर कोशिश को हम नाकाम करेंगे।”
दूसरी तरफ भाजपा समर्थित संगठन भी पीछे नहीं हैं। रविवार को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में ‘पंच लक्ष कंठे गीतापाठ महोत्सव’ का आयोजन हो रहा है, जिसमें करीब पाँच लाख लोग एक साथ भगवद्गीता का पाठ करेंगे। यह बंगाल में अब तक का सबसे बड़ा सामूहिक गीता पाठ कार्यक्रम होगा।
इस आयोजन में बाबा रामदेव, बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र शास्त्री, साध्वी ऋतंभरा और राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस मुख्य अतिथि होंगे। सूत्रों के मुताबिक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुमित भट्टाचार्य और नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी भी इसमें शिरकत कर सकते हैं। हालांकि आयोजक इसे पूरी तरह धार्मिक कार्यक्रम बता रहे हैं, लेकिन विपक्ष इसे हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश मान रहा है।
एक तरफ बाबरी शैली की मस्जिद का शिलान्यास, दूसरी तरफ पाँच लाख लोगों का सामूहिक गीता पाठ – दोनों घटनाएँ लगभग एक साथ हो रही हैं। इससे साफ है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले दोनों बड़े खेमे अपने-अपने समुदायों को गोलबंद करने में जुट गए हैं, जिससे राज्य में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका गहरा गई है।