पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-इज़रायल-ईरान युद्ध के बीच भारत की कूटनीतिक सक्रियता तेज

पश्चिम एशिया में जारी गंभीर सैन्य संघर्ष के बीच भारत ने कूटनीतिक प्रयासों को और तेज कर दिया है। इस क्रम में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से टेलीफोन पर विस्तृत चर्चा की।

यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों से क्षेत्र में तनाव चरम पर है। ईरानी विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थिति और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों, खासकर जहाजों की सुरक्षा पर गहन विचार-विमर्श किया।

ईरानी विदेश मंत्री ने होर्मुज जलडमरूमध्य और फारस की खाड़ी में उत्पन्न असुरक्षा के लिए अमेरिका तथा इज़रायल की कार्रवाइयों को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि इस अस्थिरता के लिए जवाबदेही तय की जाए।

डॉ. जयशंकर ने सोशल मीडिया पर इस वार्ता की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्होंने क्षेत्र की नवीनतम घटनाओं पर विस्तार से चर्चा की और दोनों पक्ष निरंतर संपर्क बनाए रखने पर सहमत हुए। यह वार्ता ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की नियुक्ति के बाद पहली प्रमुख बातचीत है। मोजतबा को उनके पिता अयातुल्ला अली खामेनेई की अमेरिका-इज़रायल हमले में मृत्यु के बाद यह पद सौंपा गया है।

भारत के लिए यह संकट बेहद गंभीर है क्योंकि देश अपनी तेल आवश्यकताओं का करीब 85 प्रतिशत आयात करता है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावी रूप से अवरुद्ध होने से वैश्विक तेल और गैस कीमतों में तेज उछाल आया है। यह मार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल व्यापार का केंद्र है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला पर गहरा असर पड़ रहा है। इसके अलावा, खाड़ी क्षेत्र में रहने वाले करीब एक करोड़ भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है।

डॉ. जयशंकर ने ईरान के अलावा जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल और दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री चो ह्यून से भी बातचीत की और वैश्विक चिंताओं को साझा किया। भारत का स्पष्ट रुख है कि व्यापारिक जहाजों पर हमले अस्वीकार्य हैं और हिंसा को तुरंत रोककर कूटनीति एवं संवाद के माध्यम से शांति स्थापित की जानी चाहिए।