‘देवी व बोझ’ का झूला झूलती बेटियां

आज, जब पूरा विश्व बेटी दिवस (Girl Child Day) मना रहा है, तो यह भारत में बेटियों की स्थिति पर विचार करने का सही समय है। भारतीय समाज बेटियों को एक तरफ देवी (Goddess) मानता है, वहीं दूसरी तरफ बोझ भी माना जाता है। इसी के कारण बेटियों को मानसिक और शारीरिक रूप से कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

1. भारत में लड़कियों की संख्या का सवाल

भारत में लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले कैसी है, यह एक गंभीर मुद्दा है।

कुल आबादी का अनुपात: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5,2019-21)के अनुसार, भारत की कुल आबादी में यह एक अच्छा संकेत है कि 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएँ हैं, जो पिछली बार से बेहतर है। जन्म के समय का अनुपात (SRB):हालांकि, जन्म के समय का लिंगानुपात (Sex Ratio at Birth) अभी भी ठीक नहीं है। यह 1000 बच्चों पर 929 बच्चियाँ है। यह संख्या बताती है कि ‘पुत्र-मोह’ अभी भी समाज में मौजूद है, जिसके कारण जन्म से पहले ही लिंग-चयन जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं। यह दिखाता है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी सरकारी योजनाओं के बावजूद, इस सोच को पूरी तरह बदलना बाकी है।

2. आधुनिक सोच और पुरानी परंपराओं का टकराव

21वीं सदी में भारत बदल रहा है, लेकिन पुरानी सोच अभी भी कायम है।

शिक्षा में प्रगति: अच्छी बात यह है कि लड़कियों की शिक्षा में भागीदारी बढ़ रही है। माध्यमिक स्कूल (Secondary School) में लड़कियों का नामांकन 75.5% से बढ़कर 79.4% हो गया है। लड़कियाँ साइंस और टेक्नोलॉजी (STEM) जैसे कठिन क्षेत्रों में भी आगे बढ़ रही हैं।
कामकाज का दोहरा बोझ: यह प्रगति तब धीमी पड़ जाती है जब घर की बात आती है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, महिलाएँ अवैतनिक घरेलू कार्यों (जैसे खाना बनाना, सफाई) पर रोज़ाना औसतन 236 मिनट खर्च करती हैं, जबकि पुरुष केवल 24 मिनट। इस दोहरे बोझ के कारण लड़कियों को करियर बनाने या अपने विकास के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है। यह उन्हें आर्थिक रूप से निर्भर भी बनाता है।

3. ‘देवी’ की पूजा और व्यवहार में भेदभाव

यह सबसे बड़ा सामाजिक विरोधाभास है। धार्मिक रूप से हम बालिका को ‘देवी शक्ति’ मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं, लेकिन रोज़मर्रा के जीवन में उनके साथ अलग व्यवहार किया जाता है।

हिंसा की सच्चाई: NFHS-5 की रिपोर्ट बताती है कि 18 से 49 वर्ष की लगभग एक तिहाई महिलाएँ अपने पति या परिवार के किसी सदस्य से शारीरिक या मानसिक हिंसा का शिकार हुई हैं। यह दिखाता है कि जिस समाज में पूजा होती है, उसी समाज में असुरक्षा भी है।
स्वास्थ्य में उपेक्षा: लड़कियों को अक्सर लड़कों की तुलना में कम पोषण और स्वास्थ्य सेवा मिलती है। इसका गंभीर असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। भारत में 57% महिलाएँ एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं, जबकि पुरुषों में यह दर केवल 25% है। यह पोषण में भेदभाव को दिखाता है।

4. बेटियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर

समाज की यह दोहरी अपेक्षाएँ लड़कियों के मन और शरीर पर गहरा प्रभाव डालती हैं।

मानसिक दबाव: एक लड़की पर हमेशा परिवार की ‘इज़्ज़त’ बनाए रखने का दबाव होता है, जिसके कारण उसकी आज़ादी (कपड़े पहनना, कहीं आना-जाना) सीमित हो जाती है। यह नियंत्रण और असुरक्षा का माहौल उनमें तनाव, चिंता और अवसाद (Depression) पैदा करता है। कुछ गंभीर मामलों में यह तनाव उन्हें गलत कदम उठाने पर मजबूर कर सकता है।

शारीरिक कमजोरी: कम उम्र में शादी, पोषण की कमी और चिकित्सा की उपेक्षा से उनका शरीर कमजोर होता है। उन्हें कुपोषण और एनीमिया जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का अधिक सामना करना पड़ता है। समाज उन्हें स्थायी सदस्य के बजाय एक अस्थायी सदस्य की तरह देखता है, जिससे उनकी स्वास्थ्य जरूरतों को प्राथमिकता नहीं मिलती।

 बदलाव की ज़रूरत

बेटी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि बेटियों की सफलताएँ अच्छी हैं, लेकिन उनके सामने की चुनौतियाँ भी उतनी ही वास्तविक हैं। जब तक हम केवल पूजा करने से आगे बढ़कर, अपनी बेटियों को घर और समाज में समान अधिकार, सुरक्षा और पोषण नहीं देते, तब तक यह उत्सव अधूरा रहेगा।

भारत को अपनी बेटियों को केवल धार्मिक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि समान, स्वतंत्र और मूल्यवान नागरिक के रूप में स्वीकार करना होगा। यही 21वीं सदी के भारत के लिए सही दिशा है।