सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की रिपोट में खुलासा
राजधानी भोपाल के पानी में फ्लोराइड की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई गई है। यह खुलासा सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की रिपोर्ट में हुआ है। सीजीडब्ल्यूबी की रिपोर्ट2024 में बताया गया है कि भोपाल संवेदनशील जोन में है। यहां पानी में फ्लोराइड की मात्रा कुछ स्थानों पर 1.5 एमजी/एल से अधिक पाई गई है, जबकि यह सीमा 1 एमजी/एल तक सुरक्षित मानी जाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भोपाल में बढ़ते शहरीकरण और इंडस्ट्रीयल वेस्ट निस्तारण ने भूजल की गुणवत्ता पर सीधा प्रभाव डाला है। रिपोर्ट के अनुसार भोपाल संवेदनशील श्रेणी में, यहां के ग्राउंड वाटर में μलोराइड और नाइट्रेट सीमा से अधिक है। परिणामस्वरूप इससे हड्डियां कमजोर होती हैं और दांत के रोग भी बढ़ते हैं।
नाइट्रेट का स्तर 45 एमजीएल से अधिक
सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के 531 सैंपल स्थलों में से लगभग 23 प्रतिशत स्थानों पर नाइट्रेट का स्तर 45 एमजीएल से अधिक पाया गया है। नाइट्रेट की अधिकता का मुख्य कारण कृषि भूमि में रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग और अपशिष्ट जल का रिसाव बताया गया है। विशेषज्ञों ने बताया कि अधिक मात्रा में फ्लोराइड का सेवन गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। आम समस्या डेंटल फ्लोरोसिस है। इसमें बच्चों के दांतों पर सफेद या भूरे धब्बे पड़ जाते हैं। गंभीर मामलों में दांतों की संरचना कमजोर हो जाती है। लंबे समय तक अत्यधिक फ्लोराइड से हड्डियों और जोड़ों में दर्द, कठोरता और स्केलेटल फ्लोरोसिस जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
कई जिलों में यूरेनियम की मात्रा अधिक
कई जिलों में यूरेनियम की मात्रा ज्यादा पाई गई है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राज्य के कुछ जिलों ग्वालियर, दतिया और छतरपुर में यूरेनियम की मात्रा तय पैमाने से अधिक पाई गई, जो केंद्रीय ऊर्जा नियामक मानक से अधिक है। भिंड, दतिया, ग्वालियर, नीमच और शिवपुरी जिलों में भूजल की विद्युत चालकता का स्तर अधिक पाया गया है। राज्य के लगभग 23 फीसदी सैंपलों में नाइट्रेट अधिक पाया गया है। भोपाल, विदिशा, सागर, उज्जैन, देवास, और छिंदवाड़ा जिलों का उल्लेख है जहाँ नाइट्रेट की मात्रा सबसे अधिक दर्ज की गई।