‘माझी शाळा, सुंदर शाळा’ अभियान से जुड़ा था आरोपी रोहित आर्या

मुंबई के पवई इलाके में बुधवार को हुई सनसनीखेज वारदात में आरए स्टूडियो में 17 बच्चों को बंधक बनाने वाले आरोपी रोहित आर्या को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। आरोपी करीब पांच घंटे तक बच्चों को बंदी बनाए रहा। पुलिस के समझाने-बुझाने के बावजूद जब वह नहीं माना तो जवाबी कार्रवाई में उसकी मौत हो गई। घटना के दौरान सभी बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।

बताया जा रहा है कि रोहित आर्या महाराष्ट्र सरकार की ‘मुख्यमंत्री माझी शाळा, सुंदर शाळा’ योजना से जुड़ा हुआ था। उसने दावा किया था कि इस अभियान के तहत उसकी परियोजना ‘लेट्स चेंज – पीएलए सैनिटेशन मॉनिटर’ के ₹2 करोड़ बकाया राज्य सरकार पर हैं। इसी आर्थिक विवाद को लेकर वह मानसिक तनाव में था।

क्या है ‘मुख्यमंत्री माझी शाळा, सुंदर शाळा’ अभियान?

यह योजना महाराष्ट्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी पहल है, जिसका उद्देश्य राज्य के सरकारी और निजी स्कूलों में शैक्षणिक गुणवत्ता, स्वच्छता और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देना है।

इस अभियान के तहत स्कूलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कराई जाती है ताकि शिक्षा, स्वच्छता और बुनियादी ढांचे में सुधार लाया जा सके। राज्य स्तर पर विजेता स्कूलों को ₹51 लाख तक का पुरस्कार दिया जाता है।

आर्या इसी योजना से जुड़ी एक परियोजना — ‘पीएलए सैनिटेशन मॉनिटर’ — पर काम कर रहा था, जो स्कूलों में स्वच्छता मानकों की निगरानी से संबंधित थी।

विवाद और बकाये का दावा

रोहित आर्या का आरोप था कि उसकी परियोजना का भुगतान शिक्षा विभाग ने रोक रखा है। उसने यह भी दावा किया था कि योजना का मूल खाका उसकी बनाई फिल्म ‘लेट्स चेंज’ से लिया गया, लेकिन उसे न तो श्रेय दिया गया और न ही भुगतान।

हालांकि, महाराष्ट्र शिक्षा विभाग ने इन दावों को सिरे से खारिज किया, और कहा कि आर्या पर कुछ छात्रों से सीधे शुल्क वसूलने के आरोप लगे थे। विभाग ने बताया कि विवाद के कारण उसकी फाइलें रोक दी गई थीं।

प्रशासन और विभाग की कार्रवाई

घटना के बाद पुलिस और शिक्षा विभाग दोनों ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों के मुताबिक, यह मामला न केवल एक व्यक्ति के तनाव का परिणाम है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं में निजी ठेकेदारों की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल खड़ा करता है।

यह पूरी घटना महाराष्ट्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी शैक्षिक योजना पर साया डालती है और साथ ही यह भी दर्शाती है कि सरकारी परियोजनाओं में पारदर्शिता की कमी किस तरह गंभीर नतीजों तक पहुंच सकती है।