सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा समुदाय सहित कुछ मुस्लिम समुदायों में प्रचलित लड़कियों के खतने (FGM) की प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने के लिए शुक्रवार को सहमति दे दी। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की अवकाशकालीन पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार समेत सभी पक्षकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
याचिका अहमदाबाद स्थित गैर-सरकारी संगठन ‘चेतना वेलफेयर सोसाइटी’ ने दायर की है। संगठन का कहना है कि महिलाओं का खतना इस्लाम धर्म का आवश्यक या अनिवार्य हिस्सा नहीं है, बल्कि यह लड़कियों के मौलिक अधिकारों, शारीरिक अखंडता और गरिमा का गंभीर उल्लंघन है। याचिका में तर्क दिया गया है कि गैर-चिकित्सकीय कारणों से नाबालिग लड़की के निजी अंगों को छूना या काटना POCSO अधिनियम की धारा 3, 5 और 7 का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसके लिए सात साल तक की सजा का प्रावधान है।
याचिकाकर्ता ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का भी हवाला दिया है, जिसने FGM को लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन बताया है और इसके सभी प्रकारों को पूरी तरह खत्म करने की सिफारिश की है।
गौरतलब है कि पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति बी.आर. गवई ने भी अपने कार्यकाल में इस प्रथा पर गहरी चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी देश में बेटियों के साथ FGM जैसी प्रथाएं जारी हैं और अदालत सबरीमाला मंदिर प्रवेश, पारसी समुदाय में महिलाओं के धार्मिक अधिकार जैसे अन्य लिंग-आधारित भेदभाव के मामलों के साथ-साथ इस मुद्दे पर भी विचार कर रही है।