15 मौतों के बीच सरकार ने मानीं सिर्फ 4; हाईकोर्ट ने मांगा जवाब, NHRC का मुख्य सचिव को 14 दिन का अल्टीमेटम।”

स्वच्छता के शिखर पर रहने वाले शहर इंदौर में दूषित पानी के कारण पसरा मातम अब कानूनी और राजनीतिक जंग में बदल गया है। मध्य प्रदेश सरकार ने इस मामले में अपनी स्टेटस रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश की है, जिसमें मौतों के आंकड़ों को लेकर एक चौंकाने वाला विरोधाभास सामने आया है। जहां स्थानीय लोग और अस्पताल रिकॉर्ड 15 मौतों की पुष्टि कर रहे हैं, वहीं सरकार की रिपोर्ट में आधिकारिक तौर पर केवल 4 मौतों का ही जिक्र किया गया है।

शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में इस त्रासदी से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह विवादित रिपोर्ट सामने आई। सरकार ने अपनी दलील में कहा कि दूषित जल संक्रमण से अब तक केवल 4 व्यक्तियों की जान गई है, जबकि इसके विपरीत मृतकों के परिजनों और क्षेत्रीय निवासियों का दावा है कि यह संख्या 15 तक पहुंच चुकी है। जान गंवाने वालों में 5 महीने के मासूम बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग तक शामिल हैं, जिन्हें उल्टी-दस्त, डिहाइड्रेशन और तेज बुखार की शिकायत के बाद शहर के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया था।

अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई के लिए 6 जनवरी की तारीख तय की है। सुनवाई के दौरान एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक लगाने की मांग भी उठी, जिसे अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि दूषित पानी से प्रभावित हर नागरिक को निःशुल्क और श्रेष्ठ चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। इस बीच, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस थमाया है और दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है कि आखिर सीवर का पानी पेयजल की पाइपलाइन में कैसे मिला।

इस प्रशासनिक विफलता पर राजनीतिक पारा भी चढ़ गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि इंदौर में पानी नहीं बल्कि जहर बांटा गया है और जब जनता बदबूदार पानी की शिकायत कर रही थी, तब प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सोया रहा। मामले में अब तक हुई प्रशासनिक कार्रवाई के तहत एडिशनल कमिश्नर रोहित सिसोनिया को हटाया जा चुका है और नगर निगम कमिश्नर दिलीप यादव को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। इंदौर के भागीरथपुरा और आसपास के इलाकों में अब भी डर का माहौल है और जनता का सवाल है कि क्या प्रशासन केवल सफाई के पुरस्कारों में उलझा रहा और लोगों के जीवन से जुड़े बुनियादी ढांचे की अनदेखी की गई।