नानाजी देशमुख विवि में ₹3.5 करोड़ की बंदरबांट, रिसर्च के पैसों से अफसरों ने की हवाई यात्राएं और खरीदी कारें

मध्यप्रदेश के जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में ‘पंचगव्य’ परियोजना के नाम पर हुए करोड़ों रुपये के घोटाले का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों पर रिसर्च के लिए सरकार द्वारा दिए गए ₹3.5 करोड़ के बजट को विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने शोध के बजाय निजी ऐश-आराम, हवाई यात्राओं और महंगी गाड़ियाँ खरीदने में फूंक दिया।

संभाग आयुक्त धनंजय सिंह के निर्देश पर कलेक्टर द्वारा गठित जांच टीम की रिपोर्ट में चौंकाने वाली अनियमितताएं सामने आई हैं, जिसके बाद अब संबंधित अधिकारियों पर FIR और रिकवरी की तलवार लटक रही है।

घोटाले की परतें: कैसे हुआ जनता के पैसे का दुरुपयोग?

जांच रिपोर्ट के अनुसार, 2011 में शुरू हुई इस योजना का उद्देश्य गाय के गोबर, मूत्र और दूध (पंचगव्य) से दवाइयां बनाना था, लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली:

  • हवाई यात्राएं और पर्यटन: परियोजना से जुड़े डॉ. यशपाल साहनी, डॉ. सचिन कुमार जैन और रिसर्चर गिरिराज सिंह ने शोध के नाम पर गोवा, कोलकाता, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों की 20 से अधिक हवाई यात्राएं कीं।
  • कार और पेट्रोल पर खर्च: जिस पैसे से लैब बननी थी, उससे ₹7.38 लाख की नई कार खरीदी गई। यही नहीं, ₹7 लाख पेट्रोल-डीजल और ₹3.5 लाख गाड़ी की मरम्मत पर खर्च कर दिए गए, जो योजना के नियमों के बाहर था।
  • महंगे उपकरणों की संदिग्ध खरीदी: रिपोर्ट में पाया गया कि ₹1.92 करोड़ की मशीनें और कच्चा माल (गोबर-गौमूत्र) खरीदा गया। चौंकाने वाली बात यह है कि जिन मशीनों की बाजार कीमत मात्र 15-20 लाख रुपये है, उनके लिए करोड़ों का भुगतान किया गया।
  • शून्य परिणाम: करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद इस शोध से सरकार को होने वाली आय मात्र ₹23,000 रही।

फर्जी ट्रेनिंग का खेल

जांच टीम (डिप्टी कलेक्टर रघुवीर सिंह मरावी और जिला कोषालय अधिकारी विनायकी लकरा) ने पाया कि किसानों को प्रशिक्षण देने के दावे भी संदिग्ध हैं। 2016 से 2020 के बीच जिन किसानों को ट्रेनिंग देने की बात कही गई, उनकी सूची एक सादे कागज पर बिना तारीखों के तैयार की गई थी।

विश्वविद्यालय का पक्ष और भविष्य की कार्रवाई

विश्वविद्यालय के कुलगुरु मनदीप शर्मा का कहना है कि यह एक पुरानी योजना (2011-2018) है और पूर्व में हुए ऑडिट में कोई गड़बड़ी नहीं मिली थी। हालांकि, प्रशासन की जांच रिपोर्ट अब कलेक्टर के माध्यम से कमिश्नर तक पहुंच गई है।