भोपाल मेट्रो के कमर्शियल रन को आज एक महीना पूरा हो गया है, लेकिन उम्मीदों के विपरीत मेट्रो यात्रियों के लिए तरस रही है। 20 दिसंबर को भव्य उद्घाटन के बाद शुरू हुई मेट्रो अब तक अपनी रफ्तार और पैसेंजर संख्या को लेकर संघर्ष करती नजर आ रही है।
लागत और कमाई में जमीन-आसमान का अंतर
मेट्रो प्रबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक घाटा है। आंकड़ों के मुताबिक मेट्रो के संचालन पर रोजाना करीब 1 लाख रुपए का खर्च आ रहा है। किराए के रूप में प्रतिदिन औसतन केवल 10 हजार रुपए ही मिल पा रहे हैं। एक ट्रिप में औसत केवल 30 यात्री ही सफर कर रहे हैं, जबकि एक मेट्रो में 3 कोच हैं।
14 दिन में ही बदलना पड़ा शेड्यूल
पैसेंजर्स की भारी कमी को देखते हुए मेट्रो कॉरपोरेशन ने महज 14 दिनों के भीतर ही ट्रिप घटा दी और टाइमिंग में बदलाव कर दिया। अब मेट्रो सुबह 9 बजे की बजाय दोपहर 12 बजे शुरू हो रही है और आखिरी ट्रिप शाम 7:30 बजे है। वीकेंड (शनिवार-रविवार) को छोड़कर बाकी दिनों में यात्रियों की संख्या 300 से 400 के बीच सिमट कर रह गई है। 15 जनवरी को तो यह आंकड़ा गिरकर मात्र 275 तक पहुँच गया था।
इंदौर की तुलना में भोपाल पिछड़ा
इंदौर मेट्रो के पहले दिन जहाँ 26 हजार पैसेंजर पहुँचे थे (वहाँ शुरुआत में सफर फ्री था), वहीं भोपाल में पहले दिन से ही टिकट लागू होने के कारण केवल 6,568 लोग ही आए। इसके बाद से यह संख्या लगातार गिरती गई।
भविष्य की योजना: पास और फूड जोन
मेट्रो कॉरपोरेशन अब आय बढ़ाने के लिए स्टेशनों पर एटीएम, फूड जोन और किड्स जोन विकसित करने की तैयारी कर रहा है। साथ ही, डेली अप-डाउन करने वालों के लिए पास सुविधा और बुजुर्गों व छात्रों के लिए टिकट में छूट देने पर भी विचार किया जा रहा है ताकि पैसेंजर संख्या को बढ़ाया जा सके।