लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने वैश्विक संसदीय कूटनीति को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की है। उन्होंने 60 से अधिक देशों (कुछ रिपोर्टों में 64) के साथ संसदीय मैत्री समूह का गठन किया है।
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी की है। इन समूहों में सत्ताधारी दल बीजेपी के साथ-साथ विपक्षी दलों के कई वरिष्ठ नेताओं को प्रमुख भूमिका दी गई है। कई मैत्री समूहों की अध्यक्षता विपक्षी सांसदों को सौंपी गई है।
इनमें प्रमुख नाम शामिल हैं:
- पी. चिदंबरम (कांग्रेस)
- शशि थरूर (कांग्रेस)
- अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी)
- असदुद्दीन ओवैसी (एआईएमआईएम)
- सुप्रिया सुले (एनसीपी-एसपी)
- गौरव गोगोई (कांग्रेस)
- कनिमोझी (डीएमके)
- मनीष तिवारी (कांग्रेस)
- डेरेक ओ’ब्रायन (टीएमसी)
- अभिषेक बनर्जी (टीएमसी)
- राम गोपाल यादव (समाजवादी पार्टी)
- के.सी. वेणुगोपाल (कांग्रेस)
- अरविंद सावंत (शिवसेना-यूबीटी)
सत्ताधारी पक्ष से रविशंकर प्रसाद (इजराइल), अनुराग ठाकुर (यूरोपीय संसद), निशिकांत दुबे (रूस) जैसे नेताओं को भी विभिन्न समूहों की जिम्मेदारी दी गई है।
ये मैत्री समूह पड़ोसी देशों के अलावा यूरोप, पश्चिम एशिया, अमेरिका, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों के देशों के साथ बनाए गए हैं। इनमें भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, रूस, सऊदी अरब, इजराइल, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संसद जैसे देश शामिल हैं।
लोकसभा सचिवालय के अनुसार, प्रत्येक समूह में 11 सांसद (लोकसभा और राज्यसभा दोनों से) होंगे। इसका मुख्य उद्देश्य सांसदों के बीच सीधा संवाद बढ़ाना, पार्लियामेंट-टू-पार्लियामेंट और पीपल-टू-पीपल संपर्क को मजबूत करना है। इनके माध्यम से व्यापार, प्रौद्योगिकी, संस्कृति, सामाजिक नीतियां और वैश्विक चुनौतियों जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी।
जानकारों का मानना है कि यह पहल वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति को मजबूत करेगी और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देगी। यह पहला चरण है, जिसमें आगे अन्य देशों को भी शामिल किया जा सकता है।