प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25-26 फरवरी 2026 को इज़रायल की राजकीय यात्रा की थी। उनकी वापसी के महज दो दिन बाद ही अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमला शुरू कर दिया, जिससे क्षेत्रीय तनाव चरम पर पहुंच गया। इस हमले की समय-समय पर विपक्षी दलों और सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है, जहां कई सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या मोदी की यात्रा और हमले के बीच कोई संबंध था।
इज़रायल ने इन अटकलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि इस सैन्य कार्रवाई का प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा से कोई लेना-देना नहीं था। इज़रायल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने रायसीना डायलॉग में वर्चुअल रूप से भाग लेते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी को इस ऑपरेशन के बारे में कोई पूर्व जानकारी या ब्रिफिंग नहीं दी गई थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत और प्रधानमंत्री मोदी के साथ इज़रायल के संबंध अत्यंत मजबूत और रणनीतिक हैं, लेकिन हमले का अंतिम फैसला मोदी के प्रस्थान के बाद शनिवार तड़के सुरक्षा कैबिनेट द्वारा लिया गया था।
विदेश मंत्री सार के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक वार्ता पूरी तरह विफल होने के बाद ही यह कदम उठाना आवश्यक हो गया। उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, नई बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास और हिजबुल्लाह तथा हमास जैसे संगठनों को मिल रहे समर्थन को इज़रायल के लिए गंभीर खतरा बताया। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान में सत्ता परिवर्तन अब एकमात्र व्यवहार्य विकल्प लगता है।
28 फरवरी को शुरू हुए इस संयुक्त हमले में ईरान के परमाणु स्थलों, मिसाइल क्षमताओं और मिलिशिया नेटवर्क को निशाना बनाया गया। इस दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई, जबकि तेहरान और इस्फहान जैसे प्रमुख शहरों में भारी तबाही हुई। ईरान ने जवाबी कार्रवाई में क्षेत्र भर में हमले किए, जिससे मध्य पूर्व पूरी तरह युद्ध की आग में घिर गया।
इज़रायल की ओर से बार-बार सफाई देने के पीछे मुख्य वजह भारत के साथ मजबूत संबंधों को बनाए रखना है। भारत हमेशा मध्य पूर्व में शांति और संतुलन का समर्थक रहा है। इज़रायल नहीं चाहता कि उसके प्रमुख रणनीतिक साझेदार भारत पर ईरान के खिलाफ किसी साजिश या मौन समर्थन का आरोप लगे। सोशल मीडिया पर फैली ’48 घंटे की थ्योरी’ जिसमें दावा किया जा रहा था कि मोदी की मौजूदगी के कारण हमला टाला गया को इज़रायली अधिकारियों ने सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यह महज एक ऑपरेशनल अवसर था, जिसकी मंजूरी मोदी के जाने के बाद मिली।