रंग पंचमी 2026: रंगों से सजा देवताओं का उत्सव

रंग पंचमी हिंदू धर्म का एक जीवंत और रंगीन त्योहार है, जो होली के ठीक पांच दिन बाद मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को पड़ता है। इसे ‘देव पंचमी’ या ‘कृष्ण पंचमी’ भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन देवी-देवताओं को समर्पित रंगों का खेल माना जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रंग पंचमी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी से जुड़ा है। द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ ब्रज में रंगों से होली खेली थी। ऐसी कथा है कि इस दिन देवता धरती पर अवतरित होकर भक्तों के साथ रंगोत्सव में शामिल होते हैं। इसलिए इसे ‘देवताओं की होली’ भी कहा जाता है। कुछ स्थानों पर इसे होली के लंबे उत्सव का समापन माना जाता है, जहां प्राचीन काल में होली कई दिनों तक चलती थी।

इस त्योहार का महत्व प्रेम, सद्भावना और सकारात्मक ऊर्जा से भरा है। रंग खेलने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और वातावरण में खुशी तथा समृद्धि का संचार होता है। यह वसंत ऋतु की सुंदरता और प्रकृति के विविध रंगों का स्वागत भी करता है।

उत्सव मनाने की परंपरा क्षेत्रीय रूप से भिन्न होती है। महाराष्ट्र में सूखा गुलाल उड़ाया जाता है और पूरणपोली जैसे विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। मध्य प्रदेश के इंदौर और उज्जैन में सड़कों पर रंग-मिश्रित सुगंधित जल की बौछार की जाती है। यहां ‘गेर’ या जलूस निकलते हैं, जिसमें बैंड-बाजे, नृत्य और रंगीन पानी के फायर ब्रिगेड वाहन शामिल होते हैं। ब्रज क्षेत्र, वृंदावन और मथुरा में मंदिरों में रंगोत्सव और झांकियां सजाई जाती हैं। राजस्थान में लोकनृत्य और रंग उड़ाने का विशेष आकर्षण रहता है।

रंग पंचमी न केवल रंगों का त्योहार है, बल्कि यह सामाजिक एकता, प्रेम और आध्यात्मिक उल्लास का प्रतीक भी है। इस दिन लोग एक-दूसरे पर गुलाल लगाते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और खुशियां मनाते हैं, जिससे जीवन में रंग भर जाता है।