भोपाल: जहरीले कफ सीरप से नवजात सहित करीब 24 बच्चों अपने जान गंवा चुके हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है जांच तंत्र का मजबूत नहीं होना है। राजधनी स्थित लैब में सालभर में 6 हजार जांच की क्षमता, इसलिए हर साल 5 हजार सैंपल पेंडिंग हो जाते हैं। गौरतलब है कि बच्चों की मौत के बाद देशभर में आलोचना हुई तो अब जांच तंत्र को मजबूत किया जा रहा है। दवाओं की जांच, निगरानी और अन्य संसाधनों क लिए स्वास्थ्य विभाग ने आननफानन में 211 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया है। दूसरी तरफ, खाद्य पदार्थों की जांच की पर्याप्त सुविधाएं और निगरानी नहीं होने से खाने-पीने की चीजों में भी विषाक्तता की आशंका है। यह लोगों क स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकती हैं लेकिन इसकी ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हाल यह है कि भोपाल की एक मात्र फूड लैब में माइक्रोबायोलॉजी जांच तक नहीं हो पा रही हैं।नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फार लैबोरेट्री (एनएबीएल) प्रमाण पत्र नहीं होने के कारण 4 माह से सैंपलों की जांच नहीं हो पा रही थी, जो दीपावली के चार दिन पहले शुरू हुई है। संसाधनों की कमी के चलते खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की ठीक से निगरानी नहीं हो पा रही है। एक एफएसओ को माह में 10 वैधानिक और 20 निगरानी सैंपल लेने होते हैं।