हर साल 19 नवंबर को विश्व सीओपीडी दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी फेफड़ों की पुरानी अवरोधक बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इसके रोकथाम के उपायों को प्रचारित करना होता है। इस वर्ष 2025 की थीम “आपकी सांसें मायने रखती हैं” रखी गई है, जो इस बात पर जोर देती है कि सीओपीडी से पीड़ित हर व्यक्ति की सांसें अनमोल हैं और समय पर इलाज से जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनियाभर में लगभग 39 करोड़ लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं और भारत में भी यह मौत के प्रमुख कारणों में से एक है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां चूल्हे के धुएँ और प्रदूषण का असर अधिक पड़ता है।
धूम्रपान, वायु प्रदूषण, कार्यस्थल पर धूल-धुआँ और बार-बार होने वाले श्वसन संक्रमण इस बीमारी के मुख्य कारक हैं। शुरुआती लक्षणों में लगातार खाँसी, बलगम आना, साँस फूलना और सीने में जकड़न शामिल हैं, लेकिन ज्यादातर लोग इन्हें मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे बीमारी गंभीर रूप ले लेती है। विशेषज्ञों का कहना है कि तंबाकू छोड़ना, इनडोर वायु प्रदूषण कम करना, मास्क का उपयोग और नियमित व्यायाम से इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है।
इस अवसर पर देशभर में फेफड़ा विशेषज्ञों और स्वास्थ्य संगठनों द्वारा मुफ्त स्पाइरोमेट्री जाँच शिविर, जागरूकता सेमिनार और स्कूलों में बच्चों को धूम्रपान के दुष्प्रभावों की जानकारी देने वाले कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कई अस्पतालों ने सीओपीडी मरीजों के लिए विशेष छूट और पुनर्वास कार्यक्रमों की घोषणा भी की है। डॉक्टरों का संदेश साफ है कि अगर साँस लेने में तकलीफ हो रही है तो इसे बुढ़ापे का लक्षण समझकर अनदेखा न करें, बल्कि तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।
विश्व सीओपीडी दिवस हमें याद दिलाता है कि स्वच्छ हवा में साँस लेना हर इंसान का अधिकार है और इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर तंबाकू त्याग तथा सामूहिक स्तर पर प्रदूषण नियंत्रण जरूरी है। आज के दिन हम सब संकल्प लें कि अपनी और अपने परिवार की सांसों को सुरक्षित रखने के लिए हर संभव कदम उठाएँगे।