इंदौर में दूषित पानी के सेवन से हुई कम से कम 10 लोगों की मौत और 200 से अधिक नागरिकों के अस्पताल पहुँचने के मामले में मध्य प्रदेश सरकार ने अब तक की सबसे बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की है। मुख्यमंत्री के कड़े रुख के बाद सरकार ने इंदौर नगर निगम के आयुक्त (कमिश्नर) को पद से हटा दिया है। इसी के साथ 2017 बैच के आईएएस अधिकारी और एडिशनल कमिश्नर रोहित सिसोनिया को भी तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त कर भोपाल में किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग में उप-सचिव के पद पर भेज दिया गया है। जल कार्य विभाग के प्रभारी सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर को भी इस लापरवाही के लिए निलंबित कर दिया गया है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, कमिश्नर की विफलता का मुख्य कारण निचले स्तर के अधिकारियों के बीच समन्वय का अभाव और वरिष्ठों के निर्देशों की “जानबूझकर की गई अनदेखी” रही। इसके अलावा, शहर की जर्जर पाइपलाइनों को बदलने के टेंडर में अत्यधिक देरी और टूटी हुई लाइनों को समय पर ठीक न करना उनकी विदाई की बड़ी वजह बनी।
इस घटना के बाद प्रदेश की पूरी जल वितरण प्रणाली को लेकर भोपाल से कड़े निर्देश जारी किए गए हैं। शहरी विकास एवं आवास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय दुबे ने राज्य के सभी नगर निगम आयुक्तों और मुख्य नगर पालिका अधिकारियों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु ‘युद्धस्तर’ पर काम करने का आदेश दिया है। इस सरकारी आदेश के तहत अब पूरे मध्य प्रदेश में 7 दिनों के भीतर जल वितरण नेटवर्क का व्यापक सर्वे किया जाएगा।
इस सर्वे के दौरान विशेष रूप से उन घनी आबादी वाले क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा जहाँ पाइपलाइनें 20 साल से अधिक पुरानी हैं या जहाँ पानी की लाइनें सीवर और गंदे नालों के बेहद करीब या उनके नीचे से गुजर रही हैं। सरकार ने स्पष्ट अल्टीमेटम दिया है कि यदि सर्वे के दौरान कहीं भी पाइपलाइन में रिसाव पाया जाता है, तो उसे 48 घंटे के भीतर अनिवार्य रूप से दुरुस्त करना होगा। इसके साथ ही, प्रदेश के सभी ट्रीटमेंट प्लांट और भंडारण टैंकों से पानी के नमूनों की तत्काल लैब जांच के आदेश भी दे दिए गए हैं।