आज से ठीक एक हजार वर्ष पहले, जनवरी 1026 में, महमूद गजनवी ने गुजरात के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर पर भयंकर आक्रमण किया था। यह घटना न केवल मंदिर की अपार संपत्ति की लूट का प्रतीक बनी, बल्कि भारतीय संस्कृति और आस्था पर लगातार हमलों की शुरुआत भी साबित हुई। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान रखने वाला यह मंदिर इतिहास में कई बार पूरी तरह नष्ट हुआ, लेकिन हर बार स्थानीय राजाओं, भक्तों और राष्ट्र की एकजुटता ने इसे फिर से जीवंत किया। स्वतंत्र भारत में सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में इसका भव्य पुनर्निर्माण हुआ, जो आज भी देश की सांस्कृतिक शक्ति का प्रतीक है।
प्राचीन वैभव और पहला बड़ा विनाश
सोमनाथ मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। यह स्थान प्राचीन काल से तीर्थ के रूप में जाना जाता था, जहां तीन नदियों – कपिला, हिरण और सरस्वती – का संगम है। 9वीं-10वीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहार और चालुक्य राजाओं ने इसे भव्य रूप दिया। मंदिर सोने-चांदी और रत्नों से सजा था, जहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते थे।
जनवरी 1026 में महमूद गजनवी ने अपनी सेना के साथ लंबा सफर तय कर मंदिर पर हमला बोला। उसने भारी लूटपाट की, ज्योतिर्लिंग को खंडित किया और अपार धन (लगभग 2 करोड़ दीनार) गजनी ले गया। हजारों रक्षक और भक्त इस दौरान शहीद हुए। यह आक्रमण धार्मिक प्रतीकों को नष्ट करने का एक क्रूर उदाहरण था। हालांकि, कुछ वर्षों में ही मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू हो गया। गुजरात के राजा भीमदेव प्रथम और मालवा के राजा भोज ने इसे फिर से खड़ा किया।
बार-बार विनाश और पुनरुत्थान की श्रृंखला
सोमनाथ को केवल एक बार नहीं, बल्कि कई बार निशाना बनाया गया। प्रमुख घटनाएं इस प्रकार हैं:
- 12वीं शताब्दी: चालुक्य राजा कुमारपाल ने पत्थर का भव्य मंदिर बनवाया, जो रत्नों से जड़ा हुआ था।
- 1299 ईस्वी: दिल्ली सल्तनत के अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलुग खान ने गुजरात पर आक्रमण के दौरान मंदिर को लूटा और ध्वस्त किया।
- 14वीं शताब्दी: चूड़ासमा राजा महिपाल प्रथम ने इसे फिर से बनवाया।
- 1395 ईस्वी: गुजरात सल्तनत के मुजफ्फर शाह प्रथम ने इसे नष्ट किया।
- 1451 ईस्वी: गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने अपवित्र किया।
- 1706 ईस्वी: मुगल सम्राट औरंगजेब ने इसे मस्जिद में बदलने का आदेश दिया।
इन हमलों के बावजूद, मंदिर हर बार उठ खड़ा हुआ। 18वीं शताब्दी में मराठा रानी अहिल्याबाई होलकर ने पास में छोटा मंदिर बनवाया, जहां पूजा जारी रही।
स्वतंत्र भारत में पुनर्निर्माण: सरदार पटेल का संकल्प
स्वतंत्रता के बाद जूनागढ़ रियासत पाकिस्तान में शामिल होने की कोशिश कर रही थी, लेकिन जनमत संग्रह से भारत में विलय हुआ। 12 नवंबर 1947 (दिवाली के दिन) सरदार वल्लभभाई पटेल ने खंडहरों का दौरा किया और पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि यह कार्य भारतीय एकता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक होगा।
के. एम. मुंशी की अध्यक्षता में सोमनाथ ट्रस्ट बना। जनता से चंदा इकट्ठा किया गया। अक्टूबर 1950 में अवशेष हटाए गए और मारू-गुर्जर शैली में नया मंदिर बनना शुरू हुआ। 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्राण-प्रतिष्ठा की। यह पुनर्निर्माण स्वतंत्र भारत की धार्मिक स्वतंत्रता और आस्था की जीत का प्रमाण बना।
आज का सोमनाथ: अटूट विश्वास का प्रतीक
2026 में गजनवी के पहले हमले के 1000 वर्ष और 1951 के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के तहत विशेष आयोजन हो रहे हैं, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए। लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करते हैं।
सोमनाथ की कहानी केवल पत्थरों की नहीं, बल्कि भारतीय समाज की अटूट आस्था, साहस और पुनरुत्थान की है। जैसा कि इतिहास साक्षी है – विनाश हो सकता है, लेकिन विश्वास कभी नहीं मिटता।