उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के विवादित नियमों ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशंस, 2026’ पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। बीएचयू के छात्र डॉ. मृत्युंजय तिवारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने यह अंतरिम आदेश जारी किया। कोर्ट का यह फैसला सामने आते ही पिछले तीन दिनों से उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में चल रहा सवर्ण समाज और छात्रों का उग्र विरोध प्रदर्शन अचानक जश्न में बदल गया। वाराणसी में छात्रों ने रंग-गुलाल उड़ाकर और एक-दूसरे को बधाई देकर सुप्रीम कोर्ट का आभार जताया।
विवाद की जड़ और सामाजिक प्रतिक्रिया
उल्लेखनीय है कि UGC ने 13 जनवरी को जारी इन नियमों के तहत कॉलेजों में SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों के लिए विशेष समितियां और हेल्पलाइन बनाने का प्रावधान किया था, जिसे सवर्ण समाज ने अपने खिलाफ ‘काला कानून’ करार दिया। प्रदर्शनकारियों और कुमार विश्वास जैसी हस्तियों का तर्क था कि ये नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों को ‘स्वाभाविक अपराधी’ की तरह पेश करते हैं, जिससे कैंपसों में अराजकता फैल सकती है। एटा में निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने भी इन नियमों का कड़ा विरोध किया, जबकि इसके विपरीत बरेली में भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता इन नियमों के समर्थन में सड़कों पर उतरे और इन्हें सामाजिक न्याय के लिए जरूरी बताते हुए तत्काल लागू करने की मांग की। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद इस संवेदनशील मुद्दे पर कानूनी और सामाजिक बहस तेज हो गई है।