ज़ोजिला टनल का अंतिम ब्रेकथ्रू पूरा: भारत की ऐतिहासिक इंजीनियरिंग उपलब्धि

भारत ने बुनियादी ढांचा विकास में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण ज़ोजिला टनल का अंतिम ब्रेकथ्रू (आर-पार खुदाई) सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। यह दुनिया की सबसे लंबी सिंगल-ट्यूब दो-तरफा सड़क सुरंग होगी, जो अत्यधिक ऊंचाई पर बनाई जा रही है।

इस टनल के चालू होने के बाद कश्मीर घाटी और लद्दाख को साल भर हर मौसम में जोड़ा रहेगा। चीन की सीमा के निकट भारत की सामरिक तथा नागरिक आधारभूत संरचना को मजबूत करने की दिशा में इसे एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

ज़ोजिला पास पर स्थित श्रीनगर-कारगिल-लेह हाईवे दशकों से इस क्षेत्र की जीवनरेखा रहा है, लेकिन सर्दियों में भारी बर्फबारी, हिमस्खलन और माइनस तापमान के कारण यह कई महीनों तक बंद रहता था, जिससे पूरा इलाका देश के बाकी हिस्सों से कट जाता था। नई टनल के पूरा होने के बाद यह मौसमी अलगाव अब हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

9 साल की चुनौतीपूर्ण यात्रा

लगभग 13.153 किलोमीटर लंबी मुख्य टनल के निर्माण में 1,200 से ज्यादा मजदूरों और इंजीनियरों ने नौ वर्षों तक दुनिया के सबसे कठिन और दुर्गम इलाकों में काम किया। यहां सर्दियों में तापमान माइनस 30 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता था और साल में औसतन सिर्फ 100 दिन ही काम संभव हो पाता था।

इंजीनियरों ने न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड (NATM) जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया। टनल के मार्ग में चट्टानों की संरचना में 67 बार बदलाव आया, जिसके कारण सुरक्षा रणनीति को बार-बार संशोधित करना पड़ा। टनल के अंदर बेहतर वेंटिलेशन और सुरक्षा के लिए तीन बड़े वर्टिकल शाफ्ट बनाए गए हैं। इनमें 474.3 मीटर गहरा शाफ्ट देश का सबसे गहरा वर्टिकल शाफ्ट है।

परियोजना के दौरान पिछले पांच वर्षों में पांच बड़े हिमस्खलन भी आए, जिनमें भारतीय सेना की त्वरित कार्रवाई से 172 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला गया। विशेष स्नो ब्लोअर मशीनों और भारी उपकरणों की मदद से काम को लगातार जारी रखा गया। कुल मिलाकर एक करोड़ से अधिक सुरक्षित मैन-आवर्स पूरे किए गए।

30.9 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर

ज़ोजिला टनल 30.894 किलोमीटर लंबे पूरे कॉरिडोर का मुख्य हिस्सा है। इसमें निलगर ट्विन टनल (457.35 मीटर और 1,953.63 मीटर), 2.35 किलोमीटर लंबी कट-एंड-कवर संरचनाएं और तीन बड़े पुल (कुल 460 मीटर) भी शामिल हैं।

टनल सोनमर्ग के पास बालटाल से लद्दाख के द्रास में मिनामर्ग तक जाएगी। इसके पूरा होने से कारगिल, द्रास और लेह के स्थानीय निवासियों को बड़ी राहत मिलेगी तथा भारतीय सेना की उत्तरी सीमा पर रसद आपूर्ति और भी मजबूत हो जाएगी।