मध्य प्रदेश में बांग्लादेश से आए लोगों को फर्जी दस्तावेजों के जरिए भारतीय पासपोर्ट दिलाने वाले बड़े रैकेट का एसटीएफ ने खुलासा किया है। जांच में भोपाल, ग्वालियर, छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और बैतूल के 12 पुलिस अफसरों व अन्य कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। ये सभी अब एसटीएफ की निगरानी में हैं।
यह पूरा खेल 2021 में ग्वालियर के डबरा से शुरू हुआ था। डबरा के बौद्ध विहार के एक ही पते पर 17 बांग्लादेशियों के पासपोर्ट बन गए। सभी आवेदनों में एक ही गवाह, एक ही पता और एक ही मोबाइल नंबर था, फिर भी पुलिस वेरिफिकेशन में कोई गड़बड़ी नहीं पकड़ी गई। उस समय डबरा थाने के प्रभारी विनायक शुक्ला और पासपोर्ट सेल के प्रभारी भूपेंद्र गुर्जर थे। एसटीएफ जल्द इनसे पूछताछ करेगी।
आवेदन पहुंचने से पहले ही थाने में फोन आ जाता था
जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पासपोर्ट आवेदन थाने पहुंचने से पहले ही फोन आ जाता था। कहा जाता था कि आवेदन अर्जेंट है, जल्दी क्लियर कर दो। सिर्फ एक कॉल पर वेरिफिकेशन पूरा कर दिया जाता था।
मास्टरमाइंड रियाल चौधरी के खुद के चार पासपोर्ट
रैकेट का मास्टरमाइंड रियाल चौधरी है। उसके नाम से अलग-अलग शहरों से चार फर्जी पासपोर्ट बन चुके हैं। सभी में फर्जी कागजात इस्तेमाल किए गए थे। उसने डबरा के स्थानीय दलालों के माध्यम से दस्तावेज तैयार करवाए थे। कई आवेदनों में वह खुद गवाह भी बना।
अब तक चार आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं, रियाल चौधरी, जय चौधरी बरुआ, महाराष्ट्र के उल्हासनगर से प्रियान राय और दिल्ली से विप्लव अधिकारी। आठ और लोगों की तलाश जारी है। एसटीएफ की पांच टीमें प्रदेश के बाहर भी छापेमारी कर रही हैं।
70 से ज्यादा फर्जी पासपोर्ट
अभी तक 70 से अधिक फर्जी पासपोर्ट सामने आए हैं। भोपाल के एक बौद्ध मठ के पते से करीब 40, डबरा से 17, बैतूल से 11 और छिंदवाड़ा-पांढुर्णा से एक-एक पासपोर्ट बने। विदेश मंत्रालय ने 2023 में ही मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय को आगाह किया था, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
STF एसपी राजेश सिंह भदौरिया के अनुसार, पूछताछ के आधार पर और टीमें भेजी गई हैं। मठों में आने-जाने का कोई रिकॉर्ड न होने और भिक्षुओं के अलग-अलग नाम-दस्तावेज मिलने से मठों की भूमिका भी जांच के घेरे में है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस मामले में जांच तेज कर दी गई है।