भोपाल गैस त्रासदी: इतिहास की सबसे भयानक औद्योगिक दुर्घटना और प्रमुख व्यक्तियों का योगदान

भोपाल गैस कांड 2-3 दिसंबर 1984 की रात हुआ। अमेरिका की कंपनी यूनियन कार्बाइड का भोपाल में कीटनाशक बनाने वाला कारखाना था। वहाँ से एक बहुत जहरीली गैस निकली, जिसका नाम मिथाइल आइसोसायनेट (MIC) था। पैसे बचाने के लिए कंपनी ने सारी सुरक्षा मशीनें बंद कर रखी थीं, इसलिए गैस रुक नहीं पाई और पूरे शहर पर फैल गई। उस रात हजारों लोग सोते-सोते मर गए, रास्ते में भागते हुए लोग गिरकर मर गए। कुल मिलाकर 25,000 से ज्यादा लोग मरे और 5-6 लाख लोग बीमार हो गए। आज भी कई लोग अंधे हैं, साँस की बीमारी है, कैंसर है और नए बच्चे विकलांग पैदा हो रहे हैं। कारखाने के आसपास का पानी और मिट्टी आज भी जहरीला है।

इस हादसे में सबसे बड़ी गलती अमेरिका के बॉस वारेन एंडरसन की थी। वे भोपाल आए, पुलिस ने पकड़ा भी, लेकिन कुछ घंटों में छोड़ दिया गया और उन्हें हवाई जहाज से अमेरिका भगा दिया गया। वे कभी सजा नहीं पाए और 2014 में मर गए। भारत में कंपनी के चेयरमैन केशुब महिंद्रा थे, उन्हें 2010 में सिर्फ 2 साल की सजा हुई और तुरंत जमानत मिल गई।

लेकिन कुछ अच्छे लोग भी थे जो पीड़ितों की मदद कर रहे हैं। अब्दुल जब्बार भाई खुद बीमार थे, फिर भी 35 साल तक लड़े, महिलाओं को सिलाई सिखाई और कोर्ट-कचहरी करते रहे। 2019 में वे गुजर गए। रशीदा बी और चंपा देवी शुक्ला दो बहादुर औरतें थीं, खुद गैस से पीड़ित थीं, फिर भी हजारों औरतों को जोड़ा और दुनिया भर में भोपाल की बात पहुँचाई। उन्हें विदेश में बड़ा पुरस्कार भी मिला। सतिनाथ सरंगी (लोग सथ्यू कहते हैं) हादसे के एक दिन बाद भोपाल आए और आज तक वहीं रहते हैं। उन्होंने मुफ्त अस्पताल खोला, जहरीले पानी की जांच करवाई और पीड़ितों के लिए दिन-रात काम करते हैं।

आज 40 साल से ज्यादा हो गए, फिर भी पूरा न्याय नहीं मिला। कंपनी ने थोड़े पैसे दिए थे, जो बहुत कम थे। लोग आज भी कोर्ट में लड़ रहे हैं कि ज्यादा मुआवजा मिले और पुराना कारखाना साफ किया जाए। भोपाल गैस कांड हमें सिखाता है कि पैसा बचाने के चक्कर में इंसानों की जान नहीं खोनी चाहिए।