सुप्रीम कोर्ट ने 2009 के एक एसिड अटैक मामले में ट्रायल में हुई अत्यधिक देरी पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस देरी को “सिस्टम के लिए शर्मनाक” बताया, खासकर तब जब यह मामला देश की राजधानी दिल्ली से जुड़ा है।
कोर्ट का सख्त रुख और निर्देश
बेंच ने कहा कि यह अपराध 2009 का है और इसका ट्रायल अब तक पूरा नहीं हुआ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एसिड अटैक करने वालों के साथ कानून किसी तरह की नरमी नहीं बरत सकता।
अदालत ने देश के सभी हाईकोर्ट और रजिस्ट्रार जनरल को उनके पास लंबित (पेंडिंग) एसिड अटैक केस का डेटा मांगा है, ताकि ऐसे मामलों के निपटारे की स्थिति का पता चल सके।
याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया है कि वह सुप्रीम कोर्ट में हर दिन सुनवाई के लिए अर्जी दें, जिससे इस मामले को प्राथमिकता के आधार पर सुना जा सके। इसके साथ ही, दिल्ली की रोहिणी कोर्ट में चल रहे ट्रायल के निपटारे के लिए भी आवेदन करने को कहा गया है।
मामले का विवरण
यह मामला 2009 का है, जब 26 वर्षीय एक एमबीए स्टूडेंट पर एसिड से हमला किया गया था। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि घटना को 16 साल बीत चुके हैं, लेकिन ट्रायल अभी भी पूरा नहीं हुआ है। शुरुआती चार सालों में केस में कोई प्रगति नहीं हुई थी, और अब जाकर मामला दिल्ली की रोहिणी कोर्ट में नतीजे पर पहुंचा है।
एसिड पिलाने की क्रूरता पर चिंता
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को एक नई और क्रूर प्रवृत्ति से अवगत कराया, जिसके तहत अब कई हमलावर पीड़ितों को एसिड पिलाने लगे हैं। इससे पीड़ित स्थायी रूप से विकलांग हो जाते हैं, खाना भी नहीं खा पाते और उन्हें पूरी जिंदगी इलाज की जरूरत पड़ती है।
इस चिंताजनक पहलू पर सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने सुझाव दिया कि ऐसे पीड़ितों को विकलांग व्यक्तियों के अधिकार वाले कानून (RPwD Act, 2016) में शामिल किया जाना चाहिए।
CJI ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या कानून में बदलाव करके ऐसा किया जा सकता है, जिस पर SG ने अपनी सहमति जताई।
कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता का मामला मूल रूप से हरियाणा का है, इसलिए हरियाणा राज्य को भी इस केस में एक पक्षकार बनाया जाए।