सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच द्वारा 2 दिसंबर को रोहिंग्या शरणार्थियों के प्रति की गई टिप्पणी पर गंभीर विरोध सामने आया है। देश के कई सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, वरिष्ठ अधिवक्ताओं और ‘कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स’ (सीजेएआर) के सदस्यों ने मिलकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत को खुला पत्र लिखा है। पत्र में कहा गया है कि बेंच की यह टिप्पणी न केवल अमानवीय है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के भी विपरीत है।
दरअसल, चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच एक हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप था कि दिल्ली पुलिस ने मई 2025 में कुछ रोहिंग्या व्यक्तियों को हिरासत में लिया था, जिनका उसके बाद कोई पता नहीं चल सका। सुनवाई के दौरान बेंच ने टिप्पणी की थी – “जो व्यक्ति अवैध रूप से देश में घुस आए, क्या उसे रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत करना चाहिए? हमारे अपने लाखों नागरिक गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं।” बेंच ने आगे पूछा कि क्या ऐसे लोगों को मुफ्त भोजन, आवास और बच्चों की शिक्षा जैसी सुविधाएं दी जानी चाहिए?
इस टिप्पणी से न्यायिक वर्ग में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। पत्र लिखने वालों का कहना है कि रोहिंग्या विश्व के सबसे अधिक उत्पीड़ित समुदायों में से एक हैं। म्यांमार में उन्हें दशकों से व्यवस्थित हिंसा, बलात्कार और हत्याओं का शिकार बनाया गया है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने भी म्यांमार की सेना की कार्रवाइयों को नरसंहार की श्रेणी में रखा है। स्टेटलेस होने के कारण उनके पास कोई पासपोर्ट या नागरिकता नहीं है। ऐसे में भारत में शरण लेने आए इन लोगों को केवल “अवैध घुसपैठिए” कहना न्यायपालिका की गरिमा और मानवीय दृष्टिकोण के खिलाफ है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि मुख्य न्यायाधीश के शब्द पूरे न्यायतंत्र और सरकारी तंत्र पर गहरा असर डालते हैं, जिससे निचली अदालतों और पुलिस-प्रशासन का रवैया और कठोर हो सकता है।
याचिकाकर्ता एक्टिविस्ट रीता मनचंदा ने 2020 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि रोहिंग्या को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के वापस म्यांमार नहीं भेजा जा सकता। वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि याचिका किसी प्रत्यक्ष पीड़ित की ओर से नहीं है, इसलिए उसमें लोकस स्टैंडी नहीं बनता। बेंच ने इस पर सहमति जताते हुए पहले यह तय करने की बात कही कि रोहिंग्या वाकई शरणार्थी हैं या सिर्फ अवैध प्रवासी।