ईरान के साथ चल रहे तीव्र संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने एक महत्वपूर्ण और अस्थायी कदम उठाया है। अमेरिका ने समुद्र में फंसे रूसी कच्चे तेल तथा पेट्रोलियम उत्पादों पर लगे प्रतिबंधों को सीमित समय के लिए हटाने की घोषणा की है।
यह फैसला अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) द्वारा जारी एक नए जनरल लाइसेंस के माध्यम से लिया गया है। इस छूट का प्रभाव केवल 11 अप्रैल 2026 तक रहेगा। लाइसेंस के अनुसार, यह अनुमति सिर्फ उन रूसी तेल कार्गो पर लागू होगी जो 12 मार्च 2026 की मध्यरात्रि से पहले जहाजों पर लोड हो चुके थे और वर्तमान में समुद्र में परिवहन के दौरान हैं।
वित्त मंत्री स्कॉट बेसेन्ट ने कहा कि यह कदम वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उठाया गया है, ताकि ईरान संकट के कारण तेल कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने पर अंकुश लगाया जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अल्पकालिक और संकीर्ण दायरे वाला उपाय है, जिससे रूसी सरकार को कोई बड़ा या लंबे समय तक चलने वाला आर्थिक लाभ नहीं होगा, क्योंकि रूस की अधिकांश ऊर्जा आय निकासी बिंदु पर लगने वाले करों से आती है।
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने स्वीकार किया कि अमेरिकी नौसेना अभी हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले टैंकरों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। इस स्थिति में रूसी तेल की आपूर्ति को वैकल्पिक स्रोत के रूप में अनुमति देना जरूरी हो गया था।
इस निर्णय से भारत और चीन जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों को तत्काल राहत मिल सकती है। ये देश अब बिना किसी प्रतिबंध के डर के समुद्र में फंसे रूसी तेल को खरीद सकेंगे। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक महीने की छोटी अवधि की छूट है, इसलिए इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कितना स्थायी प्रभाव पड़ेगा, यह आने वाले समय में आपूर्ति श्रृंखला की स्थिति पर निर्भर करेगा।
गौरतलब है कि 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और G7 देशों ने रूसी तेल पर सख्त मूल्य सीमा और प्रतिबंध लगाए थे। लेकिन मध्य पूर्व में जारी युद्ध और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रुकने के खतरे ने वैश्विक तेल आपूर्ति के करीब 20 प्रतिशत हिस्से को प्रभावित किया है, जिससे बाजार में भारी अस्थिरता पैदा हो गई है। अमेरिका को अब अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ा है ताकि ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाई जा सके और उपभोक्ताओं पर बोझ कम हो।