बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस मामले में अब एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने चुनाव आयोग के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। याचिका में कहा गया है कि आयोग द्वारा 24 जून 2025 को जारी किया गया यह आदेश मनमाना और असंवैधानिक है, जिससे लाखों नागरिकों का मताधिकार छिन सकता है।
ADR ने जताई लोकतंत्र को खतरे की आशंका
ADR की ओर से दायर की गई याचिका में कहा गया है कि अगर इस आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द नहीं किया गया, तो बिना किसी स्पष्ट प्रक्रिया या पर्याप्त सुरक्षा उपायों के तहत भारी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं। संगठन का कहना है कि यह न केवल स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की भावना को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि संविधान के मूल ढांचे के साथ-साथ नागरिकों के समानता और जीवन के अधिकार का भी उल्लंघन करता है।
इसके साथ ही याचिका में यह भी बताया गया है कि चुनाव आयोग का यह कदम जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के विभिन्न प्रावधानों के विपरीत है। लिहाज़ा, ADR ने शीर्ष अदालत से मांग की है कि इस आदेश को निरस्त कर जल्द राहत दी जाए।
दस्तावेजों की सख्त शर्तों पर उठे सवाल
इस विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर सबसे अधिक विरोध उन सख्त दस्तावेजी शर्तों को लेकर हो रहा है, जिन्हें पूरा करना राज्य की बड़ी आबादी के लिए बेहद कठिन है। बिहार जैसे राज्य, जहां गरीबी और पलायन की दर उच्च है, वहां जन्म प्रमाणपत्र, माता-पिता के दस्तावेज़ और नागरिकता के प्रमाण एकत्र करना बड़ी चुनौती है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों, दलित-आदिवासी समूहों और प्रवासी मज़दूरों के लिए यह प्रक्रिया और भी कठिन हो जाती है।
चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित समयसीमा को भी अव्यवहारिक और अनुचित बताया गया है। नवंबर 2025 में प्रस्तावित बिहार विधानसभा चुनावों से कुछ ही महीने पहले इस प्रक्रिया की शुरुआत करना मतदाताओं के लिए भारी दबाव बनाता है। याचिका में अनुमान जताया गया है कि करीब 3 करोड़ मतदाता, विशेषकर वंचित वर्गों से, इस प्रक्रिया के कारण अपने वोटिंग अधिकार से वंचित हो सकते हैं।
आधार और राशन कार्ड नहीं मान्य, नागरिकों पर डाली गई जिम्मेदारी
ADR की याचिका में इस बात पर भी आपत्ति जताई गई है कि आधार और राशन कार्ड जैसे आमतौर पर मान्य पहचान दस्तावेजों को SIR प्रक्रिया में मान्यता नहीं दी जा रही है। इसके बजाय मतदाताओं से उनकी नागरिकता, जन्मतिथि और जन्मस्थान से संबंधित दस्तावेज़ मांगे जा रहे हैं। यहां तक कि कुछ मामलों में माता-पिता की नागरिकता भी साबित करनी पड़ रही है, जो संविधान के अनुच्छेद 326 का उल्लंघन है।
2003 की वोटर लिस्ट बनी आधार, विपक्ष ने जताया विरोध
चुनाव आयोग का कहना है कि बिहार में मतदाता सूची की पिछली गंभीर समीक्षा 2003 में हुई थी और उसके बाद से कोई विशेष गहन पुनरीक्षण नहीं हुआ है। आयोग के अनुसार, जो मतदाता 1 जनवरी 2003 की मतदाता सूची में शामिल हैं, उन्हें सिर्फ एक गणना पत्र (Enumeration Form) भरकर जमा करना है और उनके लिए किसी दस्तावेज़ की आवश्यकता नहीं होगी। आयोग ने यह पुरानी मतदाता सूची अपनी वेबसाइट पर भी उपलब्ध करा दी है, जिसमें करीब 4.96 करोड़ लोगों के नाम हैं।
लेकिन मुख्य विवाद तब शुरू हुआ जब आयोग ने 2003 के बाद मतदाता बने लोगों से उनकी नागरिकता, जन्मस्थान और माता-पिता की जानकारी से संबंधित दस्तावेज़ मांगने शुरू कर दिए। जो नागरिक 1 जुलाई 1987 से पहले पैदा हुए हैं, उन्हें अपनी नागरिकता का प्रमाण देना होगा, जबकि 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे नागरिकों को अपने साथ-साथ अपने माता या पिता की जानकारी भी दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत करनी होगी। 2 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे नागरिकों को तो दोनों माता-पिता के दस्तावेज़ दिखाने होंगे।
राजनीतिक नीयत पर विपक्ष ने उठाए सवाल
विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और नीयत पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि इतनी कम समय सीमा में इतने सख्त दस्तावेज़ जुटा पाना गरीबों, मजदूरों और ग्रामीणों के लिए लगभग असंभव है। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
आगे की राह क्या होगी?
अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है, जहां से चुनाव आयोग के आदेश की वैधता पर कानूनी समीक्षा होगी। अदालत का फैसला यह तय करेगा कि क्या SIR प्रक्रिया लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों के अनुरूप है या नहीं। आने वाले दिनों में यह मामला न केवल बिहार बल्कि देश की चुनावी प्रक्रियाओं पर भी बड़ा असर डाल सकता है।