देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर एक बार फिर खतरनाक श्रेणी में पहुँच गया है, जिससे शहर “गैस चैंबर” में बदल गया है। इसी बीच, मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) के भारी काम के बोझ के कारण देश के कई हिस्सों में बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) की कथित मौतों का मामला गरमा गया है। इन दोनों गंभीर राष्ट्रीय संकटों के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन पर विपक्ष ने तीखी आलोचना की है।
विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि जब देश दो बड़ी मानवीय चुनौतियों से जूझ रहा है, तब सरकार की प्राथमिकता धार्मिक पर्यटन पर अधिक केंद्रित दिखती है।
दिल्ली में प्रदूषण ‘गंभीर’, लोग बेहाल
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, दिल्ली के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 400 के पार ‘गंभीर’ (Severe) श्रेणी में दर्ज किया गया है। जहरीली हवा के कारण लोगों को सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन और खांसी जैसी स्वास्थ्य समस्याएं हो रही हैं। डॉक्टर इसे बच्चों और बुजुर्गों के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल मान रहे हैं।
विशेषज्ञों की चिंता: हर साल यह आपदा लौटती है, लेकिन प्रदूषण से निपटने के लिए निर्णायक और स्थायी कार्रवाई का अभाव है, जिसका सीधा असर आम नागरिक के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
बीएलओ की मौत पर सुप्रीम कोर्ट भी सख्त
विभिन्न राज्यों, खासकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश, में मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) के अत्यधिक दबाव के चलते कई बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) की मौत के मामले सामने आए हैं। यह मौतें हार्ट अटैक और तनाव से जुड़ी आत्महत्या के कारण हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इन मौतों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए राज्यों को तुरंत कर्मचारियों पर से काम का बोझ घटाने और पर्याप्त स्टाफ नियुक्त करने का निर्देश दिया है।
प्रधानमंत्री के धार्मिक पर्यटन पर सियासी वार
दिल्ली में प्रदूषण और बीएलओ की मौत की खबरों के बीच, प्रधानमंत्री मोदी की हालिया धार्मिक यात्राओं और पवित्र स्थलों के कायाकल्प पर किए जा रहे फोकस पर विपक्ष हमलावर हो गया है। विपक्ष का कहना है कि:
“जब देश की राजधानी की हवा जहर बन चुकी है और जमीनी स्तर के कर्मचारी काम के बोझ से मर रहे हैं, तब राष्ट्र का नेतृत्व ऐसे धार्मिक दौरों पर क्यों निकल पड़ा है, मानो पूरी धरती ही नाप देंगे?”
विपक्षी नेताओं ने इसे सरकार की संवेदनहीनता करार दिया है और मांग की है कि प्रधानमंत्री को इन मानवीय संकटों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और त्वरित समाधान सुनिश्चित करने चाहिए।
हालांकि, सत्ता पक्ष का कहना है कि धार्मिक स्थलों का विकास देश की अर्थव्यवस्था में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देता है, जिससे रोज़गार पैदा होते हैं और यह ‘आस्था की विरासत’ को सहेजने का एक प्रयास है।