आज 3 जनवरी है, भारत के इतिहास का वह गौरवशाली दिन जब देश की पहली महिला शिक्षिका और आधुनिक नारीवाद की प्रणेता सावित्रीबाई फुले का जन्म हुआ था। महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में जन्मीं सावित्रीबाई ने उस दौर में शिक्षा की अलख जगाई जब महिलाओं और दलितों के लिए स्कूल के दरवाजे बंद थे। उनका जीवन संघर्ष, साहस और करुणा की एक ऐसी गाथा है, जिसने भारतीय समाज की दिशा बदल दी।
शिक्षा के लिए संघर्ष और प्रथम विद्यालय
सावित्रीबाई का विवाह मात्र 9 वर्ष की आयु में समाज सुधारक ज्योतिराव फुले से हुआ था। ज्योतिराव ने ही उन्हें शिक्षित किया और अध्यापन के लिए प्रेरित किया। 1848 में उन्होंने पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला। यह कार्य उस समय के कट्टरपंथी समाज को रास नहीं आया। जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने जाती थीं, तो लोग उन पर पत्थर और कीचड़ फेंकते थे। वे अपने थैले में एक दूसरी साड़ी लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँचकर गंदी साड़ी बदल लेती थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 1852 तक उन्होंने बालिकाओं के लिए कई और विद्यालयों की स्थापना की।
आधुनिक मराठी काव्य की अग्रदूत
सावित्रीबाई न केवल एक शिक्षिका थीं, बल्कि एक प्रखर कवयित्री भी थीं। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से शिक्षा के महत्व और जातिवाद के विनाश का संदेश दिया। उनके प्रमुख काव्य संग्रह ‘काव्य फुले’ (1854) और ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ (1892) आज भी सामाजिक न्याय के आंदोलनों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनकी रचनाओं में सादगी और विद्रोह का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
समाज सुधार और मानवीय दृष्टिकोण
सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने मिलकर ‘सत्यशोधक समाज’ के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों के उत्थान के लिए काम किया। उन्होंने विधवाओं के मुंडन की कुप्रथा के खिलाफ नाइयों की हड़ताल आयोजित की और गर्भवती विधवाओं को आश्रय देने के लिए ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की। छुआछूत जैसी कुरीति को चुनौती देने के लिए उन्होंने अपने घर का पानी का हौद अछूतों के लिए खोल दिया, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था।
अंतिम समय और शहादत
सावित्रीबाई का निधन भी समाज सेवा करते हुए ही हुआ। 1897 में जब पुणे में प्लेग महामारी फैली, तो वे खुद मरीजों की सेवा में जुट गईं। एक बीमार बच्चे को पीठ पर लादकर अस्पताल ले जाते समय वे खुद भी इस संक्रमण की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें सिखाता है कि शिक्षा ही वह अस्त्र है जिससे समाज की बेड़ियां तोड़ी जा सकती हैं। आज भारत की हर शिक्षित महिला और सफलता के शिखर पर पहुँचने वाली बेटियां सावित्रीबाई के संघर्षों की ऋणी हैं। उनकी जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।