भोपाल: राज्य सरकार ने तीन महीने पहले प्रमोशन में आरक्षण की नई नीति लागू की थी। लेकिन अब तक इसका फायदा किसी कर्मचारी या अधिकारी को नहीं मिल पाया है। वजह यह है कि नीति को लेकर अदालत में मामला अटका हुआ है।
अदालत की रोक बनी बड़ी बाधा
सामान्य, पिछड़ा और अल्पसंख्यक कल्याण समाज संस्था (SPAKS) ने इस नीति को चुनौती देते हुए अदालत में याचिका दायर की थी। 9 सितंबर को हुई सुनवाई में अदालत ने सरकार को नई नीति के तहत प्रमोशन करने की इजाजत नहीं दी। अब 16 सितंबर को फिर सुनवाई होगी, जिसमें सरकार नए तर्क रखेगी और मंजूरी लेने की कोशिश करेगी।
सरकार ने बीते मंगलवार को अदालत में पुरानी और नई नीति का तुलनात्मक चार्ट पेश किया। इसके अलावा, सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग राज्यों से जुड़े फैसलों को भी इकट्ठा कर रहा है। इसका मकसद है कि अगली सुनवाई में अदालत के सामने मजबूत पक्ष रखा जा सके।
सरकार की तैयारी और विभागों की सुस्ती
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सभी विभागों को साफ निर्देश दिए हैं कि अदालत से हरी झंडी मिलते ही प्रमोशन आदेश जारी करने के लिए पूरी तैयारी रखी जाए। यानी गोपनीय आख्या (CR), विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) और अन्य जरूरी कागजात समय पर तैयार हों। लेकिन हकीकत यह है कि कई विभाग इस पर ध्यान ही नहीं दे रहे।
कई अधिकारियों और कर्मचारियों की गोपनीय आख्या अधूरी है। कुछ विभागों ने तो लोक सेवा आयोग (PSC) को DPC कराने के लिए पत्र तक नहीं भेजा है। चूंकि PSC की प्रक्रिया लंबी होती है, ऐसे में प्रमोशन और ज्यादा देर से हो सकता है।
कर्मचारियों में बढ़ रही बेचैनी
पदोन्नति की उम्मीद लगाए बैठे हजारों कर्मचारियों में अब बेचैनी बढ़ रही है। उनका कहना है कि सरकार ने नीति तो बना दी, लेकिन अदालत की रोक और विभागों की लापरवाही की वजह से उनका हक अटक गया है। कई कर्मचारियों का प्रमोशन लंबे समय से रुका हुआ है, ऐसे में वे जल्द से जल्द इस मामले का हल चाहते हैं।
कुल मिलाकर, सरकार अदालत में नए तर्कों के साथ पूरी तैयारी कर रही है, लेकिन विभागों की सुस्ती और अधूरी व्यवस्थाएं इस प्रक्रिया को और लंबा खींच सकती हैं।