मानसिक रूप से अक्षम संतान को जीवनभर परिवार पेंशन का अधिकार: मद्रास हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

madras high court

Lifetime Pension for Mentally Disabled Child: मद्रास हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि मानसिक रूप से अक्षम संतान को सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार पेंशन प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस अधिकार को साबित करने के लिए आय प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक वैध मेडिकल प्रमाणपत्र ही पर्याप्त होगा।मद्रास हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि मानसिक रूप से अक्षम संतान को सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार पेंशन प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस अधिकार को साबित करने के लिए आय प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक वैध मेडिकल प्रमाणपत्र ही पर्याप्त होगा।

हाई कोर्ट ने कहा

हाई कोर्ट की मदुरै बेंच के न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति के. राजशेखर ने 19 जून 2025 को इस ऐतिहासिक फैसले में सेंट्रल सिविल सर्विस (पेंशन) रूल्स, नियम 54(6) का हवाला दिया। इस नियम के अनुसार, यदि किसी सरकारी कर्मचारी का पुत्र या पुत्री मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम है और 25 वर्ष की आयु के बाद भी आजीविका कमाने में असमर्थ है, तो वह जीवनभर परिवार पेंशन का हकदार रहेगा। कोर्ट ने अपने फैसले में दो टूक कहा कि पेंशन कोई खैरात या उपहार नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक अधिकार है, जिसे अनुच्छेद 21 – जीवन जीने के अधिकार – के तहत देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब नियमों में केवल मेडिकल सर्टिफिकेट की आवश्यकता बताई गई है, तो फिर अधिकारियों को आय से संबंधित अन्य दस्तावेज मांगने का अधिकार नहीं है।

क्या है पूरा मामला

इस मामले की शुरुआत तब हुई जब एक सरकारी कर्मचारी एवी जेराल्ड ने अपने मानसिक रूप से अक्षम छोटे भाई के लिए परिवार पेंशन की मांग की। अधिकारीयों की ओर से कोई सकारात्मक जवाब न मिलने पर उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर की। एकल पीठ ने याचिका को स्वीकार कर पेंशन देने का आदेश पारित किया, जिसे बाद में प्रिंसिपल अकाउंटेंट जनरल ने चुनौती दी। हालांकि, अपील पर सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया गया कि आदेश का पालन पहले ही किया जा चुका है, लेकिन अपील सिर्फ एकल पीठ की सख्त टिप्पणियों को हटाने के उद्देश्य से थी।

खण्डपीठ का फैंसला

खंडपीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 1995 के भगवंती ममतानी बनाम भारत सरकार के मामले का हवाला देते हुए कहा कि यह व्यवस्था पहले से ही कानून में निहित है, और अधिकारियों को संवेदनशीलता के साथ ऐसे मामलों में कार्य करना चाहिए।
यह फैसला न केवल विकलांग नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करता है, बल्कि शासन प्रणाली की संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व को भी उजागर करता है।