भोपाल: आईसीयू में गंभीर हालत में भर्ती मरीजों से लेकर कई सामान्य मरीज भी सही इलाज के बावजूद स्वस्थ नहीं हो पा रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इसका कारण है एंटी माइक्रोबियल रजिस्टेंस (AMR), यानी दवाओं का असर कम हो जाना। यह समस्या आज पूरी दुनिया में चिकित्सा विज्ञान के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।
एलएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. डीपी सिंह ने बताया कि लगातार एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल से शरीर में इन दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। इसके चलते पहले असरदार रही दवाएं जैसे मेरोपेनम, पेनिसिलिन और अमॉक्सीसिलिन अब आईसीयू में भी बेअसर साबित हो रही हैं। वहीं कभी अप्रभावी हो चुकी सेपटोन और क्लोरोफेनिकोल जैसी दवाएं अब फिर से असर दिखाने लगी हैं।
उन्होंने कहा कि इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि अस्पतालों और आम लोगों के बीच एंटीबायोटिक पॉलिसी का सख्ती से पालन हो। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल एएमआर के कारण लगभग 50 लाख लोगों की मौत होती है। यदि हालात यही रहे तो वर्ष 2050 तक यह आंकड़ा 1 करोड़ के पार जा सकता है।
रिसर्च और इलाज के बीच तालमेल की कमी
इंदौर से आए एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. राजेश अग्रवाल ने कहा कि आज मेडिसिन क्षेत्र में कई रिसर्च हो रही हैं, लेकिन इनके नतीजे समय पर मरीजों तक नहीं पहुंच पाते। कुछ डॉक्टर इन पर पूरा भरोसा कर इलाज करते हैं, जबकि कई बार इन्हें लागू ही नहीं किया जाता। इस असमानता से मरीजों का डॉक्टरों पर भरोसा कम हो रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि रिसर्च के परिणामों को सर्वसम्मति से अपनाकर इलाज में शामिल किया जाना चाहिए।
डॉ. अग्रवाल ने बताया कि आधुनिक जीवनशैली और कृषि पद्धतियों के कारण हमारे भोजन में पोषक तत्वों की कमी हो गई है। लंबे समय तक स्टोरेज, पेस्टिसाइड और केमिकल्स के उपयोग से फल-सब्जियों के भीतर जरूरी विटामिन और मिनरल्स घट गए हैं। यही वजह है कि अब लोगों को इन्हें दवाओं और सप्लीमेंट्स के रूप में लेना पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हर साल 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक की दवाएं खरीदी जाती हैं, जिनमें से करीब 1000 करोड़ रुपये का कारोबार सिर्फ विटामिन, मिनरल और न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स का है।
तनाव से बढ़ रहा हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट का खतरा
कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सुब्रोतो मंडल ने बताया कि अचानक होने वाले हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट के मामलों में तेजी आई है। कई मरीज कुछ देर पहले तक बिल्कुल स्वस्थ नजर आते हैं और अचानक मौत हो जाती है।
स्टडी में पाया गया है कि इसकी एक बड़ी वजह तनाव है। तनाव को शुगर और ब्लड प्रेशर की तरह किसी जांच से नापा नहीं जा सकता, इसलिए यह अंदर ही अंदर शरीर को प्रभावित करता है और गंभीर नतीजे सामने आते हैं।