मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि ऐसे रिश्तों में रहने वाली महिलाओं को कानूनी संरक्षण तभी मिल पाएगा जब उन्हें पत्नी का दर्जा दिया जाए। जस्टिस एस. श्रीमथी ने एक आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए यह बात कही। उन्होंने रेखांकित किया कि पुरुष अक्सर शुरुआत में मॉडर्न बनकर लिव-इन रिलेशनशिप में आते हैं, लेकिन जब रिश्तों में कड़वाहट आती है, तो वे कानून में स्पष्ट नियमों के अभाव का फायदा उठाकर महिला के चरित्र पर सवाल उठाने लगते हैं। कोर्ट के अनुसार, यह न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी स्थितियों में महिलाओं को संरक्षण प्रदान करे।
मामले की पृष्ठभूमि और धोखाधड़ी का आरोप
यह पूरा मामला एक आरोपी द्वारा शादी का झूठा वादा कर महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाने और बाद में मुकर जाने से जुड़ा है। पीड़िता और आरोपी स्कूल के समय से एक-दूसरे को जानते थे और अगस्त 2024 में शादी की नीयत से घर से भाग भी गए थे, लेकिन पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद आरोपी ने परीक्षा और आर्थिक तनाव जैसे बहाने बनाकर शादी को टालना शुरू कर दिया। बाद में आरोपी ने महिला के पिछले किसी रिश्ते का हवाला देते हुए विवाह से पूरी तरह इनकार कर दिया। आरोपी ने अपनी जमानत याचिका में तर्क दिया था कि यह संबंध आपसी सहमति से बना था, जिसे कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया।
BNS की धारा 69 और कस्टोडियल जांच
अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि अब शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाना एक अलग और गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। पहले ऐसे मामलों को आईपीसी की धोखाधड़ी या बलात्कार की धाराओं के तहत देखा जाता था, लेकिन नए कानून के तहत संसद ने इसे स्पष्ट अपराध के रूप में परिभाषित किया है। जस्टिस श्रीमथी ने कहा कि अपराध की गंभीरता और आरोपी के मुकरने के व्यवहार को देखते हुए उसकी कस्टोडियल जांच अनिवार्य है, इसलिए उसे अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।